Mittwoch, 4. Juni 2014

दस साल पहले (11 September 2011)

एक तस्वीर की तरह दस साल पहले 11 सितंबर का दिन मेरे सामने उभरता है. मैं जर्मन रेडियो डॉएचे वेले के हिंदी विभाग में पत्रकार था. और साथ ही रेडियो में ट्रेड युनियन का उपाध्यक्ष. दोपहर को युनियन कार्यकारिणी की बैठक के बाद जब विभाग में वापस लौटा, तो हिंदी कार्यक्रम के प्रभारी राम यादव मेरी राह देख रहे थे. पता चला कि अभी-अभी न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के एक टावर से एक जेट विमान टकराया है, मामला आतंकवाद का हो सकता है. कोई डेढ़ घंटे बाद प्रसारण था, हमने तय किया कि समाचारों के अलावा हम पहली रिपोर्ट इसी विषय पर देंगे. फिलहाल बाकी कार्यक्रम योजना के मुताबिक होगा.
हमारी बातचीत चल रही थी, सामने टीवी के पर्दे पर जलते टावर की तस्वीर थी, अचानक और एक हवाई जहाज़ तेज़ी से आते हुए दूसरे टावर से टकराया. यादव जी के गले से आवाज़ निकली, ओह्ह्ह्.....चंद लमहों की खामोशी, उसके बाद मैंने कहा, कार्यक्रम पूरा बदलना है, और प्रसारण के बारे में पहले से कुछ भी तय नहीं किया जा सकता है. हमें लाइव स्टूडियो में सबकुछ तय करना पड़ेगा.
खड़े-खड़े हमने संपादकीय बैठक निपटाया. मुझे कार्यक्रम प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदांरी दी गई. आतंकवादी हमलों के बारे में काफ़ी सामग्री हमारे पास थी, लेकिन मेरा कहना था कि इस बार कुछ भी काम नहीं आने वाला है, यह आतंकवादी हिंसा का एक नया स्तर है, मापदंड बिल्कुल बदल चुका है. एक तकनीकी समस्या यह भी थी कि 45 मिनट तक सिर्फ़ मेरी आवाज़ में कार्यक्रम बेहद ऊबाऊ होगा. हमने वाशिंगटन में अपने संवाददाता से फोन मिलाने की कोशिश की. पता चला कि फोन सेवा जैम हो चुकी है. विभाग के सारे साथी अमेरिका में पत्रकारों और परिचितों को फोन करने की कोशिश में जुट गए. हमें घटनास्थल से निजी अनुभव की ज़रूरत थी, लेकिन कहीं कोई मिल नहीं रहा था.
मुझे स्टूडियो के लिए तैयारी करनी थी. समाचार एजेंसियों की ओर से लगातार रिपोर्टें आ रही  थीं, उन्हें परखने की शायद ही गुंजाइश थी. मैंने उन्हें इकट्ठा करना शुरू किया. एक साथी समाचार बुलेटिन तैयार कर रहे थे, बाकी सभी फोन करने में व्यस्त थे. मैंने सोचा, फिलहाल शांत रहना है, देखा जाएगा स्टूडियो में क्या किया जा सकता है.
इतने में साथी महेश झा के टेबुल से आवाज़ आई, वॉयस ऑफ़ अमेरिका के साथी सुभाष वोहरा लाईन पर हैं, तुरंत स्टूडियो में पहुंचिए, मैं कनेक्ट करता हूं. दौड़ते हुए तीन कमरे के बाद स्टूडियो में पहुंचा, किसी दूसरे विभाग के साथी काम कर रहे थे, उनको लगभग धकेलकर बाहर किया, महेश ने स्टूडियो में फोन लाईन कनेक्ट किया. सुभाष से बात शुरू हुई. पता चला कि वे रेडियो भवन की सीढ़ी पर हैं, भवन खाली कराया जा रहा है. कोई नई महत्वपूर्ण सूचना वे नहीं दे पाए. लेकिन वहां कैसा माहौल है, इसकी एक जीती-जागती तस्वीर उभरी. लगभग चार मिनट की बातचीत के बाद साथी वोहरा ने क्षमा मांगते हुए कहा कि सुरक्षा कर्मी उन्हें बाहर निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं. हम दोनों की आवाज़ कांप रही थी, जैसे-तैसे बातचीत ख़त्म हुई.
पांच मिनट का समाचार, चार मिनट की बातचीत, 32-33 मिनट का समय मुझे भरना था लगातार आती खबरों से. उनके विश्लेषण की कोशिश करनी थी. दिमाग के अंदर सन्नाटा छाया हुआ था. स्टूडियो के अंदर मैं, बाहर तकनीशियन और विभाग के सारे साथी. क्या मैंने कहा था, बिल्कुल याद नहीं है. बाहर निकला तो विभाग के अध्यक्ष फ्रीडमान्न श्र्लेंडर ने कहा, कार्यक्रम ठीक हो गया. अब अगले दिनों और महीनों में भी यही मेन थीम है. एक फीकी मुस्कान के साथ मैंने कहा – अगले सालों में भी.

मेरा ठौर

पहली बात तो यह है कि जहां मैं ठहरा होता हूं, वहीं से हर चीज़ देखता हूं, वहीं से अपनी बात कहता हूं.

लेकिन क्या मैं किसी एक जगह पर ठहरा होता हूं. मैं ऐसा नहीं मानता.

शुरू के 26 साल बनारस में. बनारस के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में, शहर के बंगाली पारिवारिक-सांस्कृतिक माहौल में, कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल में. स्कूल(सेंट्रल हिंदू स्कूल) में जिस शिक्षक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा, वह आरएसएस के ज़िला सरसंघचालक थे. लड़कों को अपनी विचारधारा के तहत लाना उनका मिशन था, और उनके विचारों को काटने की कोशिश करना मेरी ज़िद. हमेशा उनसे प्रोत्साहन मिलता था, फिर भी क्लास में सारे लड़के एक तरफ़, और दूसरी ओर मैं अकेला. अल्पसंख्यक होने का अहसास शायद पहली बार तभी मिला था.

बनारसी माहौल में अगर मुझे बंगाली समझा जाता था, तो पहली बार 14 साल की उम्र में कोलकाता पहुंचने पर पता चला कि मैं तो खोट्टा हूं. इसके अलावा मैं रवींद्रनाथ का भक्त था, तो हमउम्र के बंगाली लड़के जीवनानंद पढ़ते थे. कोलकाता जाने का सिलसिला जारी रहा...कुछ एक सालों में मैं भी काफ़्का, सार्त्र, बोदलेयर और रिलके से लैस हो चुका था, लेकिन गैर होने का अहसास बरकरार रहा.

इस बीच बदनामी बढ़ती जा रही थी – लड़का सिर्फ़ पार्टी ही नहीं करता है, कविता भी लिखने लगा है. बांगला में एक पत्रिका निकाली, जो दो अंकों के बाद मर गई. हिंदी में कविताएं छपी, काशीनाथ सिंह को प्रतिभा दिखी, कॉलरदार कुर्ता पहनकर अस्सी जाने लगा, और वहां पहुंचते ही बनारस के सबसे महान कवि एक रुपये का नोट थमाकर कहते थे, जाओ बेटा, चार बीड़ा पान लगाकर ले आओ. मित्रों के बीच उन्होंने कहा था – कसिया को एक बंगाली लौंडा मिल गया है, क-वि है !

घर में सब परेशान थे, आखिर बीए पास करने में कितने साल लगते हैं ? पैसे की किल्लत थी, सो फुटपाथ पर किताब बेचने लगा. ब्रेष्त की कविताओं के अनुवाद के ज़रिये बनारस के बाहर भी थोड़ा बहुत परिचय बढ़ा, संयोग कुछ ऐसा हुआ कि रेडियो की नौकरी लेकर पूर्वी बर्लिन आ गया. उम्र अभी 27 से कम थी.

33 साल से जर्मनी में हूं. शुरू के दस साल पूर्वी जर्मनी के थे. परिवार बना, जर्मन भाषा व संस्कृति से परिचित होने का मौका मिला. नामी गरामी जर्मन लेखकों और संस्कृतिकर्मियों से निकटता हुई. पहले पार्टी के हलकों में उदारवादी के रूप में मुझे शक की नज़र से देखा जाता था, यहां समस्याएं कहीं विकट रूप से सामने आईं. तथाकथित असंतुष्टों से संपर्क बने. काफ़ी मुमकिन था कि नौकरी जा सकती थी. लेकिन जब तक ऐसी नौबत आती, जर्मनी एकीकरण के कगार पर खड़ा था. लाखों की नौकरियां गईं, संयोग से मुझे (पश्चिम) जर्मन रेडियो में ले लिया गया.

एकीकरण से पहले-पहले एक सपना था कि अब मुकम्मल समाजवाद आने वाला है. पूंजी के बुलडोज़र के नीचे यह बेवकूफ़ी जल्द काफ़ूर हो गई. यूरोपीय समाज में फैली उदारता के बीच धीरे-धीरे अपनी चमड़ी के रंग का अहसास पक्का होने लगा. बर्लिन छोड़कर कोलोन आया, एकदिन प्रोग्राम डिरेक्टर ने बड़े प्यार से कहा, यहां भारत के बहुत सारे लोग रहते हैं. घर जैसा महसूस करोगे.

गनीमत है कि „घर जैसा महसूस करने“ की ज़रूरत अभी तक नहीं पड़ी है. भारत के दोस्त हैं, पाकिस्तान के भी – उससे कहीं ज़्यादा तुर्क या ईरानी. और ज़ाहिर है कि जर्मन दोस्त. वे अक्सर पूछते हैं, जर्मन नागरिकता क्यों नहीं लेते हो. अब उनसे क्या बताऊं. मुझे जर्मनी के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ लेनी पड़ेगी. भारतीय पासपोर्ट तो ऐसे ही मिल गया था. लिया भी था, क्योंकि विदेश यात्रा करनी थी. सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भों से तो जुड़ा हूं, लेकिन पिछले तीन दशकों में राष्ट्रीयता की भावना लगातार घटती गई है.और अगर मेरी भारतीय देशभक्ति ही संदिग्ध है, तो फिर जर्मनी के प्रति निष्ठा कहां से आएगी ?

दो साल पहले एक साक्षात्कार में मुझसे पूछा गया था : आप कहां घर जैसा महसूस करते हैं ? जर्मनी में या भारत में ? मेरा जवाब था : न यहां, न वहां – मेरा एक तीसरा ठौर है. यह तीसरा ठौर बाकी दोनों की मिलावट से नहीं बना है, बल्कि उनके साथ तनाव से. साथ ही - अपने दौर के साथ तनाव से. इसी तनाव के ज़रिये मैं सबके साथ जुड़ा हुआ हूं. अकेला नहीं हूं.

फ़क्कड़ी के दिन

छात्र राजनीति सूंघने का दौर सेंट्रल हिंदू स्कूल में नौंवीं-दसवीं कक्षा में ही शुरू हो चुका था. मां-बाप कम्युनिस्ट थे, सो शुरू से ही तय था कि कम्युनिस्ट बनना है. इस लिहाज से यह कोई विद्रोह नहीं, पारिवारिक परंपरा निबाहना था. वैसे सबसे प्रिय शिक्षक थे भोला बाबु, और मैं उनका प्रिय छात्र. मैं बिना कुछ समझे-बूझे कम्युनिस्ट बनने को आमादा, और वे कट्टर संघी, आरएसएस के ज़िला सरसंघचालक. शायद यहां विद्रोही तेवर की गुंजाइश थी, और उसका जमकर फ़ायदा उठाया.
यह 67-68 का दौर था, बनारस के राजनीतिक माहौल पर कम्युनिस्ट नेता रुस्तम सैटिन छाये हुए थे, और सड़कों पर छात्र राजनीति का असर बढ़ता जा रहा था. अंग्रेज़ी साइनबोर्ड तोड़ने का मुहिम चला, जिसे उस वक्त हिंदी आंदोलन के नाम से सुशोभित किया गया था. हिंदी को कितना फ़ायदा हुआ था पता नहीं, लेकिन ख़ासकर बीएचयू के छात्रों के बीच राजनीतिक चेतना पैदा करने में इस आंदोलन की अहम भूमिका थी – और इस आंदोलन से उत्तर भारत के सबसे तेज़-तर्रार छात्र नेता उभरे थे – देवब्रत(देबु) मजुमदार. छात्र नेता के तौर पर देबुदा की शान की तुलना शायद सिर्फ़ इमरजेंसी और उसके बाद के दौर में जेएनयू के डीपीटी के साथ की जा सकती है. देबुदा अब नहीं रहे, पुलिस की पिटाई से सिर में लगी चोट दशकों बाद जानलेवा साबित हुई.
1965 में बीएचयू में फिर से छात्र संघ का चुनाव हुआ था, मुकाबला बिहार के दो भोजपुरी छात्रनेताओं – आरएसएस के लालमुणि मिश्र और समाजवादी रामवचन पांडेय के बीच थी. पांडेय जी ने मिश्राजी को पटखनी दी (और बाद में बिहार के विधानसभा चुनाव में पांड़ेजी को हराकर मिश्राजी ने बदला लिया) और उसीके साथ बीएचयू में छात्र राजनीति की बिसात पर गोटियां बिठाने का क्रम शुरू हुआ. यहां कह देना ज़रूरी है कि बीएचयू के छात्र समुदाय को अगर देखा जाय, तो तीन वर्गों के छात्र मौजूद थे. बनारस के शहरी मध्यवर्ग के छात्र, सारे भारत से इस राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में आने वाले छात्र, और पूर्वांचल के कस्बों और गांवों से आनेवाले छात्र. पहले दो वर्गों के छात्र शहराती होते थे और उन्हें मकालू कहा जाता था. कस्बों और गांवों से आनेवाले देहाती छात्र बलियाटिक कहलाते थे. मिश्राजी और पांड़ेजी – दोनों बलियाटिक थे. 66 में आरएसएस घनिष्ठ सुरजीत सिंह डंग अध्यक्ष बने, लेकिन उनकी जीत के पीछे एक उभरते हुए छात्रनेता का हाथ था, जो जल्द ही इतिहास बनाने वाला था – देबु मजुमदार. एक और दिलचस्प बात यह थी कि डंग के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक कम्युनिस्ट उम्मीदवार थे – दीपक मलिक, जो वर्षों तक छात्र राजनीति में सक्रिय रहे व बाद में प्रोफ़ेसर बने व आजकल गांधी शिक्षा संस्थान के निदेशक हैं.
उन दिनों विद्यार्थी परिषद आरएसएस से जुड़े छात्रों और अध्यापकों का संयुक्त संगठन था व छात्र संगठन के रूप में उसकी कोई धार नहीं थी. एक छात्र संगठन के रूप में परिषद की रूपरेखा तैयार करने के पीछे सैद्धांतिक नेता के रूप में राम बहादुर राय का विशेष योगदान रहा है. कट्टर संघी व व्यक्तिगत संपर्कों में अत्यंत मृदु स्वभाव के रायसाहब बाद में जनसत्ता के यशस्वी पत्रकार बने.
1967 में कम्युनिस्ट संगठन एआईएसएफ के नरेंद्र सिन्हा को भारी मतों से हराकर मजुमदार अध्यक्ष बने. मज़े की बात यह है कि सिन्हा के समर्थन में आरएसएस के लालमुणि मिश्रा जी-जान से जुट गये थे. ज़ाहिर है कि यहां बिहारी समीकरण काम कर रहा था. सिन्हा बिहार के थे. बहरहाल, मजुमदार के चुनाव में मकालू ग्रुप की राजनीतिक चेतना पहली बार उभरकर सामने आई. बलियाटिक ग्रुप तो ठाकुर-भुमिहार व किसी हद तक यूपी-बिहार के मुद्दों पर काम किये जा रहा था.
पूरे उत्तर भारत में छात्रों के बीच समाजवादी आंदोलन की पकड़ मज़बूत हो चुकी थी. लोहिया के गैरकांग्रेसीवाद का बर्चस्व था. प्रदेश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी समाजवादी युवजन सभा की पकड़ थी. बीएचयू में इस संगठन के नेताओं में शामिल थे मजुमदार के अलावा रामवचन पांडेय, जो हमेशा हर अभियान में साथ रहते थे, लेकिन उन्हें कोई पूछता नहीं था. मार्कंडेय सिंह की संगठन में अच्छी पकड़ थी. युवा कार्यकर्ताओं में आनंद थे, मोहन प्रकाश थे – भुमिहारों की पूरी एक जमात थी. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं चंचल कब से पहली पांत में आए.
बहरहाल, 1968 में अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक ध्रूवीकरण सामने आया. आरएसएस के उम्मीदवार थे दामोदर सिंह, जिनके पीछे बाहुबलियों की पूरी एक जमात खड़ी थी. समाजवादी युवजन सभा के आधिकारिक उम्मीदवार तो मार्कंडेय सिंह थे, लेकिन मजुमदार पिछले साल के अपने प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र सिन्हा का समर्थन कर रहे थे. चुनाव के दौरान ही आरएसएस की ओर से दहशत का ऐसा एक माहौल तैयार किया गया कि उनके विरोध में किसी एक उम्मीदवार को वोट देने का माहौल तैयार किया गया. मैं इसी साल पीयुसी के छात्र के तौर पर विश्वविद्यालय में आया था. कैंपस का राजनीतिक माहौल दंग करने वाला था, और साथ ही दहशत का भी अहसास पूरी तरह से था. अंततः नरेंद्र सिन्हा की अच्छे अंतर से जीत हुई. लेकिन आरएसएस इस जीत को मानने के लिए तैयार नहीं दिख रहा था. कुलपति ने भी आरएसएस का समर्थन करते हुए चुनाव के बाद कहा कि सिन्हा अगर ढाई हज़ार छात्रों के अध्यक्ष हैं, तो दामोदर सिंह भी उन्नीस सौ के अध्यक्ष हैं.
दरअसल, विश्वविद्यालय में आरएसएस, व साथ ही, जातिवाद के निहित स्वार्थों की एक संरचना अपनी पैठ जमा चुकी थी और मजुमदार का एजेंडा उसके ख़िलाफ़ था, कम्युनिस्ट भी इस एजेंडा के साथ थे. मेरा निजी अनुभव भी झकझोरने वाला था, यहां अध्यापक और छात्रों के बीच का रिश्ता नदारद था, दूसरे एजेंडों के तहत रिश्ते बन रहे थे. कुलपति जोशी के बंगले पर एक मामुली प्रदर्शन के बाद मजुमदार, सिन्हा, दीपक मलिक व अन्य कई नेताओं को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया, पूरे साल तक छात्रों का विरोध चलता रहा, अनिश्चित काल के लिये विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया. कैंपस पीएसी और छात्रों के बीच युद्ध का मैदान बना रहा. अंततः गजेंद्रगडकर आयोग की स्थापना हुई. उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही शांति स्थापित की जा सकी.
1970 की शांति के पीछे कई प्रक्रियाएं काम कर रही थीं. दूसरे छात्र संगठनों की तर्ज़ पर विद्यार्थी परिषद को नया रूप देने का काम शुरू कर दिया गया था, जिसके चलते आने वाले सालों में आरएसएस की पकड़ मज़बूत होती गई. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ सीपीआई की निकटता बढ़ रही थी, जिसकी पराकाष्ठा इमरजेंसी के प्रति कम्युनिस्टों का समर्थन थी. समाजवादी आंदोलन टूट रहा था, लेकिन एसवाईएस की आत्मा जीवित थी. समाजवादी और आरएसएस – दोनों अब कांग्रेस के विरोध में थे, लेकिन जेपी आंदोलन से पहले तक कैंपस की राजनीति में उनके बीच कोई निकटता नहीं आई. जेपी आंदोलन में भी समाजवादी संगठन युवा जनता और आरएसएस का संगठन जनता युवा मोर्चा समानांतर ढंग से काम करते रहे.
कम्युनिस्टों की हालत पतली थी, क्योंकि उनके पास कद्दावर छात्र नेता नहीं रह गये थे. उनके उम्मीदवार डीपी मिश्रा को हराकर मार्कंडेय सिंह अध्यक्ष बने, आरएसएस के समर्थन से निर्दलीय छात्रनेता संतोष कपुरिया अध्यक्ष बने, बाद में आरएसएस के नज़दीकी एक बाहुबली ने उनकी हत्या कर दी. कम्युनिस्टों ने असंतुष्ट समाजवादियों के समर्थन का रास्ता अपनाया, लेकिन उन्हें इसमें कोई सफलता नहीं मिली. हां, उनके समर्थन से कांग्रेस के हरिकेश बहादुर एक बार ज़रूर जीते.
कैंपस के समाजवादी आंदोलन में धीरे-धीरे वरिष्ठ नेता राजनारायण की भूमिका बढ़ती जा रही थी, और उसी के साथ घट रही थी मजुमदार की पकड़. लेकिन बाद के वर्षों में जिन समाजवादी छात्र नेताओं को सफलता मिली, वे राजनारायण के नज़दीकी चक्र के नहीं थे – मिसाल के तौर पर चंचल या मोहन. जेपी आंदोलन के साथ कम्युनिस्ट और समाजवादी दो विपरीत छोर पर खड़े हो चुके थे. लेकिन यहां मैं कहना चाहूंगा कि कम्युनिस्टों की कैंपस राजनीति आरएसएस के खिलाफ़ लक्षित थी. समाजवादियों का भी यही रुख़ था. इसलिये ये दोनों धारायें अपने आपसे रिश्ते को तय नहीं कर पा रही थी. जेपी आंदोलन शुरू होने के बाद स्थिति बदल गई. अब उनके साथ होने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.
जेपी आंदोलन, कुलपति श्रीमाली का दौर, छात्र नेता के रूप में आनंद कुमार का आगे बढ़ना, चंचल कुमार – मकालू या बलियाटिक ? ये अलग जटिल विषय हैं. फिर कभी इनकी चर्चा होगी. यह भी बताना चाहूंगा कि मेरा व्यक्तिगत अनुभव कैसा था.

भटकते-भटकते

छात्र राजनीति में सक्रिय होने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बाद में राजनीतिक स्पेस ढूंढ़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है. लुभावनी सम्भावनाएं दिखती हैं, लेकिन चार-पांच-छः या इससे भी अधिक सालों के काम आखिरकार कोई मायने नहीं रखता, आपको नये सिरे से शुरुआत करनी पड़ती है. और अगर नेता के रूप में आपका दबदबा रहा हो, तो यह और मुश्किल हो जाता है. इसलिये छात्र नेता बाद में अक्सर अवसरवादी बन जाते हैं, चाहे वे जेएनयु के हों, या लखनऊ, यहां तक कि बनारस का भी यही किस्सा है.
कम्युनिस्टों की बात थोड़ी अलग है. उनका जनाधार अब तो हिंदी क्षेत्र में खत्म हो चुका है, सत्तर के आस-पास तक थोड़ी बहुत थी, और छात्र संगठन और पार्टी के बीच समन्वय कहीं बेहतर हुआ करता था. कुछ अपने पेशों में आगे बढ़ते थे और कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी के रूप में समाज में अपनी प्रतिष्ठा से संतुष्ट रहते थे. पार्टी संगठन के लिये व्यवस्थित रूप से छात्र मोर्चे से कैडर चुने जाते थे. चाहे करात हों या येचुरी – सब इसी प्रक्रिया से आए हैं. सीपीआई में भी यह सिलसिला था.
मेरी हालत थोड़ी अलग थी. मैं छात्र मोर्चे में एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता था, छात्र नेता कतई नहीं. पार्टी तंत्र में समन्वित होने के लिये जिस वैचारिक अनुशासन की ज़रूरत होती है, उसके लक्षण भी मुझमें नहीं दिख रहे थे. दोस्तों के बीच, यहां तक कि अभिभावक पीढ़ी के बीच भी पढ़ने-लिखने वाला लड़का समझा जाता था, लेकिन व्यवस्थित ढंग से पढ़ाई पूरी करने के मामले में एकदम बेकार था. 1970 से 1978 तक बीए के विद्यार्थी के रूप में अपना परिचय देता रहा, कभी युनिवर्सिटी के अंदर तो कभी बाहर. इसके अलावा घर की गरीबी एक समस्या थी, चाय-सिगरेट-रिक्शे का किराया...और कभी-कभी घर चलाने में मदद के लिये भी पैसे जुटाने पड़ते थे. 1970 से 74 के बीच बनारस और लखनऊ में 6 बार जेल भी जा चुका था और मोटे तौर पर मुझे पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता माना जाता था, जिस पर ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता था.
मेरा भाई प्रदीप एक तेज़-तर्रार युवा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रूप में उभर रहा था, जिसमें पार्टी नेता के सभी क्लासिकीय गुण मौजूद थे. सैद्धांतिक समझ, सांगठनिक पकड़, ईमानदार, संजीदा, हिम्मती और बोलने में भी तेज़. सबसे पहले उसे मुहल्ले में पार्टी कमेटी का सचिव बनाया गया, और उसने पार्टी संगठन को काफ़ी चुस्त दुरुस्त कर दिया. इसके बाद उसे बीएचयु में पार्टी का काम करने के लिये कहा गया. छात्र नेता तो वह नहीं बना, लेकिन थोड़े ही समय बाद वह कैंपस में पार्टी संगठन के लिये ज़िम्मेदार बन गया. उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी अध्यापकों, कर्मचारियों और छात्रों – इन तीनों धड़ों में पार्टी संगठन की नींव डालना. इसमें वह काफ़ी सफल रहा, लेकिन यह इमरजेंसी से पहले व उसके दौरान के साल थे, आरएसएस के विरोध में कुछ भी करना ठीक था, कुलपति डा. श्रीमाली के साथ पार्टी की अस्वस्थ निकटता बनी. मज़े की बात यह है कि इस स्थिति से कांग्रेसी सबसे ज़्यादा नाराज़ थे, क्योंकि श्रीमाली ने समझ लिया था कि कुछ व्यक्तिवादी कांग्रेसी नेताओं के बदले एक व्यवस्थित कम्युनिस्ट संगठन उनके लिये ज़्यादा उपयोगी हो सकता है. दूसरी ओर कम्युनिस्टों को ख़ुशफ़हमी थी कि वे पार्टी के फ़ायदे में श्रीमाली का उपयोग कर रहे हैं और उनका एक बौद्धिक जनाधार बन रहा है. इमरजेंसी के दौरान ही संजय गांधी के एक थपेड़े से सारा जनाधार तितरबितर हो चुका था. प्रदीप उसके बाद एक साल के लिये मास्को चला गया, लौटने के बाद कुछ ही दिनों में अजय भवन में पार्टी स्कूल में शिक्षक के रूप में उसे बुला लिया गया.
बहरहाल, बीएचयू की छात्र राजनीति में राजनीतिक संदर्भ सामने थे और उनके पीछे जातिवाद के समीकरण की मुख्य भूमिका थी. एआईएसएफ़ भी इससे जुड़ा हुआ था. ठाकुर आम तौर पर आरएसएस के साथ थे. चंचल जब अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्हें बिरादरी के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला था और वह परिषद के उम्मीदवार के खिलाफ़ फ़ैसलाकून था. लेकिन चंचल ने कभी ठाकुरवाद की राजनीति नहीं की. भूमिहार समाजवादियों के साथ थे, लेकिन मार्कंडेय सिंह के बाद वे किसी एक उम्मीदवार पर सहमत नहीं हो पाए, और वरिष्ठ समाजवादी नेता राजनारायण के दबदबे के बावजूद वे दूसरी पांत में ही रह गए. भुमिहार नेताओं में प्रमुख थे अनिरुद्ध, महेंद्रनाथ और सारंगधर राय. लेकिन इनकी वजह से सिर्फ़ समाजवादियों के वोट कटते थे और परिषद के उम्मीदवार की जीत होती थी.
छात्र आंदोलन की मिज़ाज के साथ आरएसएस की परंपरा वाले परिषद के कार्यकर्ता जुड़ नहीं पाते थे और इसलिये जेपी आंदोलन का पूरा फ़ायदा युवा जनता को मिला. चंचल अध्यक्ष चुने गए थे, फिर जेपी आंदोलन के शिखर पर अध्यक्ष पद पर मोहन प्रकाश और उपाध्यक्ष पद पर अंजना प्रकाश भारी बहुमत के साथ जीत हासिल कर चुके थे. पुराने छात्र नेताओं में आनंद कुमार जेएनयु जा चुके थे और प्रकाश करात को शिकस्त देकर उन्होंने सनसनी पैदा कर दी थी. आनंद अगर इमरजेंसी के दौरान भारत रहे होते, जेल गए होते तो शायद वे एक महत्वपूर्ण समाजवादी नेता बने होते. बहरहाल, बनारस में शतरुद्र प्रकाश युनिवर्सिटी से सटे कैंट चुनाव क्षेत्र में अपना राजनीतिक स्पेस तैयार कर रहे थे, मेरे ख्याल से बाद में वे दो बार यहां से विधायक बने. मोहन का भावी राजनीतिक स्पेस राजस्थान में था. चंचल का ऐसा कोई स्पेस नहीं था, लेकिन आपात काल में जेल यात्रा और जार्ज से संपर्कों के कारण सन 77 के बाद वे जनता पार्टी के समाजवादी धड़े में अच्छे-खासे दादा बन गये. जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे लोगों में नचिकेता से मेरी व्यक्तिगत मित्रता थी, लेकिन नचिकेता देसाई में राजनीतिक नेता बनने की महत्वाकांक्षा नहीं थी. वह जो कुछ बनना चाहता था, कमोबेश वैसी ही ज़िंदगी उसकी बनी.
मोहन प्रकाश और खासकर चंचल व्यक्तिगत रिश्तों में काफ़ी दोस्ताना बने रहे, हालांकि कम्युनिस्टों और समाजवादियों के राजनीतिक रिश्ते काफ़ी कड़वे हो चुके थे. चंचल की एक खासियत यह भी थी कि देहाती पृष्ठभूमि से आने के बावजूद वह फ़ाइन आर्ट्स् के छात्र थे, जहां छात्र-छात्राएं सबसे हाइ-फ़ाइ हुआ करते थे. मजुमदार के बाद पहली बार समाजवादियों को एक छात्र नेता मिला था, जो बलियाटिक के साथ-साथ मकालू ग्रुप को आकर्षित कर रहा था. यह कोई दिखावा नहीं था, मेरी राय में चंचल के व्यक्तित्व में ये दोनों पहलू मौजूद थे. हम घनिष्ठ तो नहीं थे, लेकिन कभी-कभी बातचीत होती थी और सौजन्य का अभाव कभी नहीं दिखा.
राजनीतिक स्पेस की समस्या सबसे विकट रूप से मजुमदार के सामने आई. 1974 में वह शहर दक्षिणी से विधानसभा का चुनाव लड़े, छात्रों ने उनके समर्थन में पूरे क्षेत्र में टेंपो तैयार किया, लेकिन समाजवादी संगठन बनाने में काफ़ी कमज़ोर हुआ करते थे. 17 हज़ार वोट पाकर जनसंघ के चरणदास सेठ विजयी रहे, उसके पीछे कम्युनिस्ट गिरजेश राय को 13 हज़ार, कम्युनिस्ट पार्टी छोड़कर बीकेडी के उम्मीदवार बुधराम सिंह यादव को 12 हज़ार और मजुमदार को 11 हज़ार वोट मिले. यह एक अच्छा आधार हो सकता था, लेकिन मजुमदार फिर कभी इस लोकप्रियता को छू नहीं पाए. उनके चेले देखते ही देखते आगे बढ़ते गए, और वह खुद कभी कांग्रेस तो कभी जनता दल का दरवाज़ा खटखटाते रहे. लेकिन आरएसएस से दूरी उन्होंने हमेशा बनाये रखी.
कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता बने रहने के अलावा मेरी कभी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी, न उसकी कोई गुंजाइश थी. एक उभरते युवा कवि के तौर पर थोड़ी बहुत मान्यता मिली थी और ब्रेष्त की कविताओं के अनुवाद और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता की हैसियत से मैं भारत जीडीआर मैत्री संगठन के हलकों के करीब आया, पूर्वी जर्मनी से आए मेहमानों से भी संपर्क हुआ. उन्हें अपनी विदेश प्रसारण संस्था रेडियो बर्लिन इंटरनेशनल के हिंदी विभाग के लिए एक युवा पत्रकार-उद्घोषक की ज़रूरत थी. जुलाई, 1979 में जब मेरे सामने प्रस्ताव आया तो स्वीकार न करने की कोई वजह नहीं थी. 26 नवंबर को मैं बर्लिन पहुंच चुका था. अब ज़िंदगी का एक नया दौर शुरू होने वाला था.

मेरी तीर्थयात्रा

Just the worst time of the year
For a journey,
And such a long journey…

दिल्ली से मास्को, फिर वहां से पूर्वी बर्लिन – जैसी कि एक कम्युनिस्ट की यात्रा होनी चाहिए. मुल्क छोड़ने से पहले राजनीतिक अभिभावकों ने चेताया था : मास्को-बर्लिन पहुंचकर हमारे बच्चे बिगड़ने लगते हैं, जिस काम से गए हैं उसे भूल जाते हैं. शराब में डूब जाते हैं, सिर्फ़ लड़कियों के चक्कर में रहते हैं. हमारी नाक मत कटवाना, कायदे से अपना काम करना, कभी-कभी पार्टी-वार्टी में थोड़ी पी लेना, लेकिन घर में खरीदकर मत लाना, फिर उस पर कंट्रोल रहेगा. और हां, शादी मत कर बैठना. मैं तो कमोबेश अपनी नानी के आदेश के किसी संस्करण को मानने वाला था. उन्होंने कहा था – ठंडा मुल्क है. शाम को गरम दूध में एक चम्मच ब्रांडी डालकर पी लेना.
सीपीआई उन दिनों समाजवादी देशों के लिये टूरिस्ट एजेंसी और नेताओं के बच्चों के लिए वजीफ़ा समिति की तरह थी. लेकिन यहां भी मेरा मामला कुछ अलग था. मैं पार्टी के काम से या पार्टी के कोटे में पढ़ने के लिये नहीं, तकनीकी हिसाब से निजी तौर पर नौकरी के लिए जा रहा था. जिन्हें इस बात का पता था, उनमें से कुछ बेहद ख़ुश थे, कुछ बेहद जल रहे थे. और नसीहत हर किसी से मिल रही थी. दिल्ली में मैं एक रिश्तेदार के घर ठहरा था, लेकिन रोज़ अजय भवन जाता था. बनारस छोड़ते वक्त घर छोड़ने का अहसास नहीं हुआ था, शायद वक्त की कमी की वजह से – जर्मनी जा रहा हूं, यह ख़बर फैल जाने के बाद हमउम्रों के बीच, ख़ासकर उसके आधे हिस्से में मेरा भाव काफ़ी बढ़ चुका था और मैं जमकर उसका फ़ायदा उठा रहा था. दिल्ली में दस दिन बिताने पड़े, कोई काम-धाम नहीं था, और पहली बार लगा कि मैं मुल्क छोड़कर जा रहा हूं, कब लौटूंगा पता नहीं. एक बंगाली लेखक ने कहा है कि घर छोड़कर विदेश जाने से पहले एक अजीब सी मनस्थिति हो जाती है, पड़ोस में किसी बिल्ली के मरने पर भी बंदा रोने लगता है. कनॉट प्लेस के बीच में घास के मैदान में बेंच पर बैठे-बैठे मैं भी एकदिन रो पड़ा था. अपने बनजारेपन का सारा घमंड काफ़ूर हो चुका था.
अजय भवन में आया था, जर्मनी जा रहा हूं जानकर एक परिचित सीनियर कामरेड तहकीकात के लिए आए. वे सोवियत संघ की यात्रा कर चुके थे, शायद ओम्स्क, इर्कुटस्क या व्लादिवोस्टोक की. काफ़ी व्योरे के साथ उन्होंने यात्रा के लिये मेरी तैयारी का जायज़ा लिया. ध्रुवमामा (डा. डी जे मुखर्जी) का ओवरकोट, नाना के सूट को ऑल्टर करके एक नया सूट ( वे तीस के दशक में इंगलैंड की यात्रा कर चुके थे, और नानी ने कहा कि इस सूट में बिल्कुल साहब लगते थे ), अपने परिवार और बनारस के स्टैंडर्ड के मुताबिक बाटा के नये जूते, ऊन के मोज़े, मां के बुने हुए ऊन के दस्ताने, मफ़लर – सीनियर कॉमरेड काफ़ी संतुष्ट दिखे. फिर उन्होंने पूछा कि गरम टोपी ली है या नहीं. टोपी की बात दिमाग में थी ही नहीं. उन्होंने अपना माथा पटक लिया. “कॉमरेड, तुम्हें पता ही नहीं है कि वहां का जाड़ा क्या होता है. चालीस-पचास-साठ...“, फिर कुछ ठहरकर उन्होंने कहा “माइनस में“. एक दिन बाद उड़ान थी. सोचा, देखा जाएगा.
26 नवंबर, 1979. पहली बार न सिर्फ़ मुल्क से बाहर जा रहा था, बल्कि पहली बार उड़ भी रहा था. 26 साल के नौजवान के लिए यह कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन मैं अपने-आपको उस समय बिल्कुल बच्चे जैसा महसूस कर रहा था. प्लेन अभी ज़मीन पर ही थी, लेकिन मैं पूरा नर्वस हो चुका था. उड़ान से पहले ही पता चल चुका था कि एआईएसएफ़ के अध्यक्ष रह चुके टाइगर दयाल की रूसी पत्नी और बेटी भी उसी फ़्लाइट से मास्को जा रही हैं. अपनी सीट पर बैठने के बाद देखा कि उन्हें भी मेरे साथ सीट मिली हुई है. रूसी भाभी अच्छी हिंदी बोलती थी, बेटी अंग्रेज़ी – थोड़ी ढाड़स मिली.
लेकिन मेरे दिमाग में चालीस-पचास-साठ...क्या पता एक सौ साठ – माइनस की दहशत छाई हुई थी. कामरेड ने बड़ी बारीकी से समझाया था कि कैसे दो मिनट के अंदर न्युमोनिया हो सकती है और एक घंटे के अंदर मौत. आने से पहले एक बहुत बड़े नेता ने पूछा था कि मैं फ़ॉरेन एक्सचेंज ले रहा हूं कि नहीं. मैंने इसके बारे में सोचा भी नहीं था, सो पूछा : ज़रूरी है क्या ? उन्होंने तुरंत कहा, नहीं-नहीं, बर्लिन एअरपोर्ट पर ही रेडियो के लोग तुम्हें रिसीव कर लेंगे. फिर उन्होंने कहा, ये दो सौ रूपए रख लो, यहां एअरपोर्ट पर डॉलर में बदल लेना. बर्लिन पहुंचकर अपनी चाची को दे देना. मेरी चाची, यानी उनकी पत्नी, जो उन दिनों पूर्वी बर्लिन में थीं. जेब में पहली बार डॉलर थे, उनकी गर्मी का अहसास अच्छा लग रहा था, भले ही वे अपने न हों.
हर टरमॉएल पर लग रहा था कि प्लेन अब क्रैश होने वाला है. कुछ एक सहयात्रियों के चेहरे पर ऊब देखकर बेहद ढाड़स मिल रही थी. दिमाग के अंदर गूंज रहा था : टोपी-टोपी-टोपी...जेब में सरसरा रहे थे 25 डॉलर, भले ही वे अपने न हों. एअर इंडिया की फ़्लाइट थी, मातृभूमि की सुंदर विमान परिचारिकाएं थीं, मन को समझाने की कोशिश कर रहा था – जी भर कर देख लो बेटा, इसके बाद सिर्फ़ गोरी लड़कियां होंगी. सोचने की कोशिश करने लगा, गोरी लड़कियां कैसी होती हैं. पता है कि स्वच्छंद होती हैं, लेकिन मातृभूमि की बदनामी नहीं होने देनी है. अगला टरमॉएल आया, तो आंखें बंदकर सोचने लगा कि गोरी लड़कियां अपने मौलिक रूप में कैसी दिखती होंगी. हिप्पियों की राजधानी बनारस में मुझे इसका अनुभव हो चुका था, लेकिन सिर्फ़ एकबार...और अपने उस सौभाग्य से मैं इतना उत्तेजित था कि ठीक से कुछ देखा ही नहीं था. आंखे खुली, तो बगल में रूसी भाभी बैठी हुई थी. शर्माकर मैं दूसरी ओर देखने लगा. जैसे-तैसे दो ढाई घंटे बीत गए, और मैं मास्को पहुंचा.
मास्को का शेरेमेत्येवो एअरपोर्ट. 1980 के ओलंपिक खेलों की तैयारी में उसे आधुनिक बनाया गया था. यूरोपीय मापदंड से औसत, लेकिन बनारसी तो उसका तामझाम देखकर दंग रह गया. इसके सामने तो पालम बिल्कुल फेल था. उस ज़माने में हम भारत को बड़े फ़ख्र के साथ तीसरी दुनिया का हिस्सा कहते थे, शिवपालगंज के      लोगों की तरह देश के स्वाधीन पिछड़ेपन पर हमें अभिमान था. यहां लेनिन की धरती से पहली मुलाकात में अपनी ज़िंदगी का मिशन मेरे लिए बिल्कुल साफ़ हो गया : आज हम पालम हैं, कल शेरेमेत्येवो बनेंगे, जहां कोई भूखा नहीं होगा. वह दिन ज़रूर आएगा.
लेकिन मुझे भूख सता रही थी. एअर इंडिया फ़्लाइट का खाना अच्छा था, लेकिन मुझ बनारसी के लिए बिल्कुल नाकाफ़ी. चारों ओर बड़े-बड़े रेस्त्रां दिख रहे थे, मेरी जेब में 25 डॉलर भी थे, लेकिन वे मेरे अपने नहीं थे. दो घंटे बाद बर्लिन की फ़्लाइट थी. दुकानों में घूम-घूमकर देखने लगा. आधी दुकान लकड़ी के पुतलों से भरी थी, पुतलों के चेहरों में पूरी बराबरी, जैसी कि कम्युनिजम में होनी चाहिए. वैसे मुझे कुछ अजीब सा लगा कि इन दुकानों में सोनी, फिलिप्स या नेसले जैसी पश्चिमी कंपनियों के माल भरे पड़े हैं. उनके नाम भी एक ही थे – बेर्योज़का. मुझे कहां से पता होता कि हार्ड करेंसी की दुकानों की समाजवादी अर्थनीति कितनी बीहड़ होती है...
यूरेका !!! टोपियां !!! सफ़ेद-लाल-नीली-पीली-काली...टोपियां. हुम्...पीली शायद नहीं. पर क्या फ़र्क पड़ता था. मैं उस उपभोक्तावाद की उन्मादना के साथ टोपियों को देखने लगा, जो भारत में दस-पंद्रह साल बाद आने वाला था. कीमतें ? आठ, दस, बारह, पंद्रह, बीस या उससे ऊपर. इस बीच मेरी बुद्धि थोड़ी काम करने लगी थी, और मैं समझ गया था कि पालम की तरह यहां भी ड्यूटी फ़्री शॉप है, और ये कीमतें बेशक डॉलर में होंगी. दो समस्याएं थीं : ये महिलाओं की टोपियां थीं, और मेरी जेब के 25 डॉलर मेरे अपने नहीं थे. खैर, पैसे अगर जेब में हों, तो अपने ही होते हैं. और जहां महिलाएं हों, क्या पुरुष नहीं होंगे ? टोपी की शकल में ही सही. अंदर गया, तो एक शेल्फ़ पर काली फ़र की टोपियां थीं, जैसा कि वार एंड पीस फ़िल्म में कज़्ज़ाक अफ़सरों को पहनते देखा था. सेल्समैन से दिखाने को कहा, मगर सारी टोपियां मेरे सिर से बड़ी थीं, खैर उन्हीं में से छांटकर सबसे छोटी टोपी ली. कीमत 7, तो दस डॉलर का नोट दिया. सेल्समैन ने इशारे से कहा काफ़ी नहीं है, और दो. पांच का नोट बढ़ाया, उसने रसीद काटी तो पता चला कि वह सात रूबल की टोपी थी, यानी 12 डॉलर 75 सेंट. आनेवाले दिनों में आंख पर उतर आने वाली यह कज़्ज़ाक फ़र टोपी बर्लिन में मेरा ट्रेड मार्क बनने वाली थी, जिसकी कहानी बाद में सुनाउंगा. लेकिन फ़िलहाल मैं ख़ुश था कि पांच मिनट में न्यूमोनिया और एक घंटे में मौत का खतरा टल गया.
मास्को से बर्लिन तक की उड़ान वैसी ही रही, सिर्फ़ थोड़ी सी चिंता थी कि एअरपोर्ट पर कोई होगा या नहीं. सुटकेस आसानी से मिल गया, उसे ढोते हुए बाहर निकला. इमिग्रेशन से बाहर निकलते ही शुद्ध हिंदी में सुनाई दिया : नमस्कार, मैं श्र्लेंडर हूं. बर्लिन में आपका स्वागत. ये अगले 27 साल तक मेरे बॉस होने वाले थे. मेरे हाथ से उन्होंने सुटकेस लिया, जो बहुत बड़ा तो नहीं था, लेकिन अप्रत्याशित रूप से भारी था. इसके अंदर क्या है ? चौंककर उन्होंने पूछा. रवींद्रनाथ की संपूर्ण रचनावली, मैंने कहा. वह अपनी गाड़ी से मुझे मेरे लिये निर्धारित फ़्लैट में ले आए. कहा कि मैं अगले दिन सुबह 9 बजे तैयार रहूं, वे मुझे दफ़्तर ले जाएंगे. बेहद थका हुआ था, मैं कुछ ही मिनटों में सो गया. अगले दिन से मेरी नई ज़िंदगी शुरू होने वाली थी.

बाल बाल बच गए

यूरोप की बारिश वैसे ही मनहूस होती है, फिर कोलोन का तो कोई जवाब ही नहीं.

नवंबर की वो एक शाम थी. हल्की बारिश में भीगते-भीगते अपने पुश्तैनी पब में पहुंचा. अदर पहुंचते ही मूड खराब हो गया - एक भी परिचित चेहरा नहीं. बार के सामने एक ऊंचे स्टूल पर बैठा, हमारे मालिक, यानी पब के साकी हेलमुट ने बिना कुछ पूछे बियर का गिलास रख दिया. चुस्की लेते हुए इधर-उधर देखा, बगल के स्टूल पर एक युवती बियर पी रही थी. उनके हाथ में सिगरेट थी. उम्र कोई चालीस की रही होगी. मैंने भी सिगरेट का पैकेट निकाला - ऐशट्रे उनके सामने था, इससे पहले कि मैं कुछ कहता, मोहतरमा ने ऐशट्रे को दोनों के बीचोबीच रख दिया.

बियर की चुस्की ले रहा था, बोर हो रहा था. बाहर देखा था तो धीमी-धीमी बारिश जारी थी. निर्मल वर्मा याद आए, लेकिन दिल नहीं बहला. महिला की ओर देखा और लगभग स्वगतोक्ति के अंदाज़ में मैंने कहा - कल धूप निकलने वाली है.

उन्होंने मेरी ओर देखा. चंद लमहों की ख़ामोशी. फिर उन्होंने कहा - "मैं लेसबियन हूं."

पता नहीं मुझे क्या सूझा. मैंने जवाब दिया - "मैं भी."

"क्या ?" - महिला ने चौंककर पूछा - "आपका मतलब ?"

अब मुझे ख्याल हुआ कि मैं क्या कह गया हूं. अब अपनी बात समझानी थी. लेकिन क्या खाक समझाता, जबकि मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा था.

फिर एक बियर की चुस्की, और मैंने कहना शुरू किया :

"देखिये, यह तो हर कोई देख सकता है कि मैं मर्द हूं. लेकिन बात यह है कि एक मर्द के जिस्म में मेरा एक औरत का वजूद है."

"ओह, यानी कि आप समलैंगिक हैं. " - उन्होंने कहा.

"दरअसल, इतना आसान नहीं है" - अब मैं पब के मूड में आ गया था. "हालांकि मेरा वजूद एक औरत का वजूद है, लेकिन मुझे मर्द पसंद नहीं हैं. एक औरत के तौर पर मैं औरतों को पसंद करता हूं."

"हुम्", उन्होंने कहा. पूछा - "और यह चलता कैसे है ?"

"हां, थोड़ा मुश्किल है. कोई औरत जब मेरे साथ होती है, वह सोचती है कि मैं मर्द हूं और वैसे ही मुझसे पेश आती है. जबकि मैं चाहता हूं कि वो मुझे औरत समझते हुए मेरे साथ पेश आवे. कभी-कभी मुझे लगता है कि वो मेरे साथ धोखा कर रही है."

एक लंबी खामोशी. फिर उन्होंने पूछा : "और आपको पता कैसे चला कि आप औरत हैं ?"

मुझे लगा कि मैं अपने ही बनाए फंदे से अब बाहर आ रहा हूं. मैंने कहा - "आप तो जानती ही हैं कि हम औरतों का सोचने का तरीका कुछ अलग होता है."

हम दोनों ने अपने गिलास खाली किए. बेयरे ने मेरे सामने नया गिलास रखा. उन्होंने हाथ हिलाकर मना किया, पैसे चुकाकर वापस जाने लगी. अपना जैकेट पहनकर मेरी ओर देखते हुए मुस्कराकर उन्होंने कहा - "कहानी दमदार थी."

रहो, पर क़ायदे से

वही मेरा पुराना पब - वही स्टूल - मूंछों वाला वही हमारा साकी हेलमुट - वैसी ही एक शाम, जब कोई परिचित चेहरा न हो. बगल के स्टूल पर एक लंबा-चौड़ा जर्मन, देखने से पता नहीं चलता कि प्लंबर है या कसाई. एक नया चेहरा. संयोग से दोनों का गिलास ख़त्म हुआ, जैसा कि रिवाज है, हेलमुट ने चुपचाप दो नया गिलास रखकर पुराने गिलास हटा लिए.

अपना गिलास उठाकर उसकी ओर देखते हुए मैंने कहा - प्रोस्त, यानी चीयर्स का जर्मन संस्करण.

उसने मेरी ओर देखा. बिना कुछ कहे एक लंबी चुस्की ली. मूंछे पोंछने के बाद उसने कहा - "हुम्...दरअसल विदेशियों से मुझे कोई एतराज़ नहीं है..."

ये अलफ़ाज़ मेरे लिए अपरिचित नहीं थे. यह नव्बे का दशक था. शरणार्थियों के मारे जर्मनी की हालत जितनी ख़राब थी, उससे भी ज़्यादा उस ख़राबी को भुनाने के लिए दक्षिणपंथी नेताओं की कोशिशें जारी थीं. मैंने छूटते ही उससे पूछा : "हां, लेकिन ?"

"हां", उसने अपनी बात जारी रखी, "मुझे यह कतई पसंद नहीं कि सारी दुनिया के लोग यहां आते रहे, और हमारे क़ायदा कानून की धज्जियां उड़ाते रहे."

"बिल्कुल सही कहते हैं आप", मैंने कहा, "ऐसा नहीं होना चाहिए."

"अब देखो ना", अचानक "तुम" पर उतरते हुए उसने कहा, "आंकड़े कहते हैं कि विदेशियों के बीच अपराधियों की संख्या जर्मनों से तीन गुनी है. ऐसा नहीं चल सकता. हमारे मुल्क में आओगे, सारी सहुलियत लोगे और अपने सारे कुकर्म जारी रखोगे...ऐसा नहीं चल सकता."

मैं सोचने लगा. अभी दो दिन पहले देश के दक्षिणपंथी गृहमंत्री मानफ़्रेड कांथर ने बहुत क़ायदे से तैयार किये गये आंकड़ों के सहारे कहा था कि विदेशियों की वजह से देश में अपराध बढ़ रहे हैं. तीन गुने का आंकड़ा भी उन्हीं का दिया हुआ था. कितनी जल्दी मंत्री की बातें आम जनता के तर्क बनकर सारे मुल्क में फैलने लगती हैं.

"आप" पर ज़ोर देते हुए मैंने कहा, "आप ठीक कहते हैं, मंत्रीजी ने भी यही बात कही है. काफ़ी ख़बर रखते हैं आप. वैसे...आप करते क्या हैं ?"

"मैं ट्रक चलाता हूं." - संक्षेप में उसने जवाब दिया.

"अच्छा पेशा है", मैंने कहा, "देखिये, मैं तो पत्रकार हूं. और आंकड़े कहते हैं कि ट्रक चालकों के बीच अपराधियों की संख्या पत्रकारों की तुलना में ढाई गुनी है." मैंने तुक्का मारा. फिर मुस्कराते हुए मैंने कहा, "वैसे इससे क्या फ़र्क पड़ता है ? आप भले आदमी हैं, मैं भी एक भला आदमी हूं. दिनभर हमने मेहनत की है. अब शाम को साथ बियर पी रहे हैं. यही तो सबसे बड़ी बात है. है ना ?"

एक सांस में सारा बियर नीचे उतारकर बार के ऊपर उसने पांच का नोट रखा. बिना कुछ कहे बाहर निकल गया. हेलमुट दूर खड़ा था. बियर का नया गिलास लेकर आया. मेरे सामने रखते हुए उसने कहा, "ये हाउस की ओर से है". फिर उसने जो कुछ कहा, उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा - क्या दिया गुरु !

इज़्ज़त का कारोबार

कुछ एक साल पहले की बात है. बनारस में उस वक्त इज़्ज़त का मौसम चल रहा था. आज दैनिक के दफ़्तर में गया हुआ था, पत्रकारों से बात हो रही थी, विदेशी मीडिया के प्रभाव पर चर्चा छिड़ी, तो एक पत्रकार ने गुजारिश की कि मैं इस मुद्दे पर एक साक्षात्कार दे दूं. मेरा काम तो साक्षात्कार लेना हुआ करता था, खैर मान गया. साक्षात्कार कैसे हुआ इसकी चर्चा छोड़ी जाय, बहरहाल वह छप गया. उसके दो हफ़्ते बाद शहर के पत्रकार संघ से फ़ोन आया कि वे मेरा सम्मान कर देना चाहते हैं, साथ ही चाहते हैं कि विदेशी मीडिया के कुप्रभाव पर हो रही परिचर्चा में बोलूं. मुझे यह विषय कुछ चुनौती जैसा लगा, मैं मान गया.
निर्धारित समय पर पड़ारकर भवन में पहुंचा, तो वहां कई दिग्गज मौजूद थे. दिल्ली से विभांशु दिव्याल और इंस्टीट्युट ऑफ़ मास कम्युनिकेशंस से मेरे पुराने मित्र प्रमोद माथुर आये हुए थे. चाय समोसे के साथ हमारा स्वागत हुआ, भाषण सुनने पड़े, बोलना भी पड़ा. वहां के माहौल से मुझे ऐसा लगा कि भूमिपुत्र होने के नाते मुझे सम्मान तो दिया जा रहा है, लेकिन शहर में वामपंथी युवा कार्यकर्ता के रूप में मेरे पुराने परिचय के कारण एक खेमा मुझसे निपटने के लिये तैयार होकर आया है. विदेशी मीडिया से बहुतों का मतलब अपसंस्कृति से था, सवाल भी अधिकतर कपड़ों की अपर्याप्तता के बारे में पूछे गये. मैंने उनसे कहा कि कपड़ों का अभाव को अगर अपसंस्कृति का मुहावरा समझा जाय, तो हमारी फ़िल्मों में उसके बहुतेरे नमूने देखे जा सकते हैं. एक नौजवान से मैंने पलटकर पूछा कि अगर किसी युवती अभिनेत्री का थोड़ा सा बदन दिख जाय तो वे इतने घायल क्यों हो जाते हैं. यूएनआई के शहर प्रतिनिधि ने अपने सवाल के तहत पश्चिमी संस्कृति के बारे में एक लंबे भाषण के बाद मुझसे कहा कि मैं हां या ना में जवाब दूं कि ऐसी हालत में...वगैरह-वगैरह. मैंने उनसे हां या ना में जवाब देने को कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी को पीटना छोड़ दिया है या नहीं. कुल मिलाकर माहौल मुझे पसंद आ रहा था.
एक युवा पत्रकार से परिचय हुआ, जो बार-बार मुझे कायल करने की कोशिश कर रहा था कि वह मेरी गहन विद्वता और विरल प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित है. इसी बीच शहर के वरिष्ठ पत्रकार ईश्वरी लाल मिश्र ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं दो दिन बाद काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में हो रही परिचर्चा में आऊं और वहां अपने विचार रखूं. मैंने उनसे पूछा, किस विषय पर, तो उन्होंने कहा कि विषय आप खुद चुन लीजिएगा. मैंने हामी भर दी. मेरा युवा पत्रकार मित्र काफ़ी उत्साहित दिखा और उसने कहा कि वह भी वहां पहुंच जाएगा.
काशी विद्यापीठ भी गया. दिव्याल जी ने एक क्रांतिकारी भाषण दिया. आज़ादी के दिनों की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि वे आज के पत्रकारों से हाथ जोड़कर विनती करना चाहते हैं कि अगर वे त्याग के लिये तैयार नहीं हैं तो यह पेशा छोड़ दें. मुझे जब बोलने का मौका मिला तो मैंने कहा कि अब क्या इस समाज में पत्रकार ही त्याग के लिये बचे हैं ? मेरा कहना था कि अगर पत्रकार अपने पेशे की ईमानदारी बरकरार रख पाते हैं, तो यह काफ़ी होगा. सारी खामियां यहीं दिख रही हैं. थोड़ी बहस हुई, जो परिचर्चा में जान लाने के लिये ज़रूरी भी थी. इसके बाद पता चला कि यहां भी मेरा सम्मान किया जाएगा. एक गणेश की मूर्ति दी गई, माला पहनाया गया. एक शाल ओढ़ाया गया.
बहरहाल, मंच पर बैठने के कुछ देर बाद ही मेरा युवा मित्र कुर्सी के पीछे उंकड़ू मार कर बैठते हुए मुझसे कह गया था कि वह आ गया है. मैंने प्रथानुसार अपनी ख़ुशी भी ज़ाहिर की थी. जब भाषण चलने लगे, पहला घंटा दूसरे घंटे की ओर सरकने लगा, तो वह फिर एकबार आया. उसने मुझसे कहा कि उसे अब जाना पड़ेगा. समझदारी दिखाते हुए मैंने कहा कि दफ़्तर का काम सबसे पहले. उसने कहा - नहीं सर, दफ़्तर से आज मैंने छुट्टी ले रखी है. दरअसल, मुहल्ले के क्लब में आज मुझे सम्मान दिया जाने वाला है.
मुझे अपने सम्मान की गरिमा की सापेक्षता के बारे में सचेत होना पड़ा. गनीमत है कि सम्मान देने का यह फ़ैशन बनारस में अब कुछ ढीला पड़ गया है. पिछले तीन-चार सालों से मुझे कहीं भी सम्मान देने के लिये बुलाया नहीं गया है. कभी कभी उसकी कमी खलती है. फिर सावधान हो जाता हूं : लालच बुरी बला है.

मैं सीआईए का एजेंट हूं.

गोदौलिया से चौक की ओर रास्ते पर दाहिने हाथ कोई पचास मीटर की दूरी पर ऐसेज़ नाम का एक मध्यवर्गीय रेस्त्रां हुआ करता था. पत्थर पर नक्काशी किये हुए किसी हद तक प्राचीन द्वार के अंदर अहाते में रेस्त्रां था, और बाहर फुटपाथ पर एक चाय की दुकान . बात 1974 की है. मैं वहीं से गुज़र रहा था कि देखा कि कई परिचित-अपरिचित नौजवान वहां खड़े-खड़े चाय पी रहे थे. उनमें से एक थे मेरे मित्र और इस बीच संबंधी अमिताभ भट्टाचार्य या बलाई. उन दिनों सीपीएम में सक्रिय बलाई ने मुझे देखते ही तपाक से बुलाया, चाय का आर्डर दिया, फिर परिचय करवाया - ये हैं उज्ज्वल, सीपीआई करते हैं और ये हैं नचिकेता, गांधीवादी हैं, आजकल जेपी आंदोलन में सक्रिय हैं.

नचिकेता ने मेरी ओर देखा और ठंडी आवाज़ में उसने कहा - हां, मैं सीआईए का एजेंट हूं. मुझे लगा कि यह तो बड़ा बेहुदा लड़का है. अभी जान-पहचान हुई नहीं कि हमला करने लगा. खैर, उसकी साधारण सी पोशाक की ओर देखते हुए मैंने कहा - लगता है कि सीआईए वाले पैसे देने में कंजूसी करते हैं. उसने मेरी पोशाक की ओर देखा और कहा - लगता है केजीबी वाले उससे भी ज़्यादा कंजूस हैं. मैंने कहा - मुझे क्या पता. जिनको देते हैं वे जानते होंगे. वैसे यह सही है कि जेपी आंदोलन के समर्थकों पर सीआईए के एजेंट होने का प्रचार चलाया गया था, ख़ासकर उनके ख़िलाफ़ जो किसी पार्टी से जुड़े नहीं थे. नचिकेता भी किसी पार्टी में नहीं थे. इसीलिये वह नाराज़ थे.

राजनीतिक रूप से वे गहरी निराशा के दिन थे. हालांकि पूरा विश्वास था कि जेपी का आंदोलन फ़ासीवादी है, लेकिन जिनके साथ हम साथ-साथ लड़ चुके थे, जेल में भी साथ थे - अब वे शासन के दमन तंत्र के शिकार थे और हम सरकार का समर्थन कर रहे थे. कई साल से बीएचयू में था, लेकिन डिग्री के नाम पर घंटा. कुछ दिनों से पीपीएच में काम कर रहा था. सोचा ईवनिंग कॉलेज में भर्ती होकर कम से कम बीए पास कर लिया जाय. वहां पहुंचा, तो सहपाठी के तौर पर मिले नचिकेता देसाई. चंद ही दिनों में दोस्ती हो गई. मैंने भी कभी सीआईए वाली बात नहीं छेड़ी.यह इमरजेंसी का दौर था. सीपीआई का सिपाही होने के नाते मैं इमरजेंसी का समर्थक और नचिकेता सबवर्सिव प्रचार में लगा हुआ. मुझे पता तो था, राजनीति पर बहस भी होती थी, लेकिन उसके राजनीतिक कामों के बारे में कभी बात नहीं हुई. उसके लिये स्थिति बेहतर थी, क्योंकि अधिकतर छात्र और अध्यापक इमरजेंसी के ख़िलाफ़ थे, लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था.

इसी बीच कॉलेज में डिबेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका विषय कुछ इस प्रकार का था - सामाजिक समता की ख़ातिर निजी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि नचिकेता निजी स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने वाला था, और मैं मन मारकर सामाजिक समता के पक्ष में खड़ा हो गया था. लेकिन जब डिबेट शुरू हुई, तो नचिकेता ने श्रोताओं से समझदारी की अपील करते हुए कहा कि वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है. उस परिस्थिति में इमरजेंसी का इससे प्रभावी विरोध कुछ हो ही नहीं सकता था. लेकिन इससे भी अचरज की बात यह थी कि जब मैं बोलने को खड़ा हुआ, मेरी ज़ुबान बंद सी हो गई, मुझसे कुछ बोला नहीं गया. माफ़ी मांगकर मैं मंच से उतर आया. नाटक का आखिरी अंक अभी बाकी था. सभा की कार्रवाई ख़त्म होने के बाद जब हम बाहर आये, तो वहां पुलिस खड़ी थी. नचिकेता को गिरफ़्तार कर लिया गया. अभी हाल में मुझे पता चला है कि थाने में ले जाने के बाद उसे छोड़ दिया गया था, क्योंकि उसने कुछ कहा नहीं था.

कुछ एक साल पहले फ़ोन पर हमारी बातचीत शुरू हो गई थी. वह गुजरात 2002 की दहशत से उबर नहीं पाया था. पहली ही बातचीत में उसने कहा कि जेपी आंदोलन में संघ को प्रतिष्ठा मिल गई, यह ग़लत था. इस बीच उस आंदोलन के बारे में मेरी राय काफ़ी बदल चुकी थी. फिर हम असहमत रहे, हालांकि कोई बहस नहीं हुई. चंद माह पहले अफ़लातून के बेटे व बेटी की जुड़वां शादी के मौके पर नचिकेता बनारस आया था, लगभग 38 साल बाद हमारी मुलाकात हुई. फिर एकबार सड़क के किनारे बेंच पर चाय, फिर एकबार गुजरे दिनों में लौट जाने की कोशिश...कितने बदल चुके हैं हम, लेकिन फिर भी वैसे ही लफ़ंगे रह गये हैं.

बर्लिन ! बर्लिन !

इसी शीर्षक से प्रसिद्ध जर्मन लेखक कुर्ट तुखोल्स्की की एक व्यंग्य रचना है. लेकिन मेरा इरादा व्यंग्य नहीं है. बर्लिन मेरी यादों का शहर है, जहां मैं 26 साल की उम्र में आया था और ज़िंदगी के 14 दिलचस्प साल मैंने इस शहर में बिताये. जब भी इस शहर में लौटता हूं, उन दिनों की याद और साथ ही, इस शहर की छोटी-छोटी घटनाओं में से झांकता इतिहास मेरे सामने तैर उठता है. मैं काफ़ी बदल चुका हूं, लेकिन यह शहर उससे भी ज़्यादा बदल गया है. इस कदर, कि मुझे लगता है कि किसी ने मेरी कोई प्यारी चीज़ मुझसे छीन ली है – जहां मेरा घर था, आज मैं वहां टूरिस्ट बन गया हूं.

अपने ठिकाने से निकलकर आज मेरा पहला पड़ाव था टाखेलेस, या जहां अभी दो साल पहले तक टाखेलेस हुआ करता था – शहर के केंद्र में ओरानियेनबुर्गर टोर के पास एक टुटा-फुटा मकान, जिसे अपने कब्ज़े में लेकर शहर के (ख़ासकर पूर्वी हिस्से के) युवा अपना अड्डा बना चुके थे – वैकल्पिक अराजकतावादी संस्कृति का केंद्र. यह इलाका सारे यूरोप के आवारा युवा संस्कृतिकर्मियों का मक्का बन चुका था. मकान अब भी उसी हालत में है, उसके सामने कई रेस्त्रां पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, जिनमें से एक भारतीय रेस्त्रां भी है. सामने आइनस्टाइन कैफ़े में युवा मैनेजर से पूछता हूं : क्या हाल है इलाके का ? मुंह बिचकाकर वह जवाब देता है – सन्नाटा है. बिजनेस कैसा चल रहा है ? – मेरा अगला सवाल. शिकायत करना मुश्किल है – वह जवाब देता है. इससे बड़ी तारीफ़ बर्लिनवाले से उम्मीद नहीं की जा सकती. मुस्कराकर सामने (भूतपूर्व) टाखेलेस की ओर देखता हूं. विशाल तख्ती पर हाइनर म्यूलर के नाटक Anatomie Titus Fall of Rome के प्रदर्शन की घोषणा. इस नाटक की प्रस्तुति के बाद ही टाखेलेस को यह भवन छोड़ना पड़ा था.

हाइनर म्युलर, ब्रेष्त के बाद जर्मन भाषा के सबसे बड़े नाटककार. मुझे 1989-90 की एक बातचीत याद आ गई. शहर के केंद्र में शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन जहां शुरू होती है, वहां चंद साल पहले जर्मन सम्राट फ़्रीडरिष द्वितीय की विशाल मूर्ति स्थापित की गई थी. हाइनर म्यूलर का सवाल :  “घोड़े पर सवार सम्राट के नीचे छोटी मूर्तियों को देखा है ?“ “हां, कौन सी ख़ास बात हैं उनमें ?“ खांटी ह्विस्की की छोटी सी चुस्की लेने के बाद हाइनर का जवाब : “सामने जनरलों और पादरियों की मूर्तियां, और पीछे जहां घोड़ा हगता-मूतता है, वहां जगह दी गई है लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को. हां, यह जर्मन इतिहास है.“

कुछ ख़ूबसूरत हैं, कुछ बदसूरत, लेकिन बर्लिन में विशाल भवनों की भरमार है. सम्राटों के ज़माने के भवन, तानाशाहियों के ज़मानों के भवन, और अब पूंजीवाद का जयगान करते हुए भवन, ख़ासकर शहर के केंद्र में – बर्लिन शहर आज जर्मन मेगालोमैनिया की कार्यशाला – उसका मंच बन चुका है. कला की दूसरी विधायें भले ही दम तोड़ रही हों, वास्तुकला अल्हड़पन के साथ बेरोकटोक अपनी जवानी का प्रदर्शन कर रही है. टहलते हुए फ़्रीडरिशश्ट्रासे तक पहुंचता हूं. दाहिने जाने पर ब्रेष्त की समाधि मिलेगी, बांये ब्रेष्त की आख़िरी कर्मभूमि बर्लिनर आंसाम्बले. मैं बांई ओर का रास्ता पकड़ता हूं. थोड़ी देर बाद मोड़ आता है, दाहिनी ओर बर्लिनर आंसाम्बले का भवन दिखाई दे रहा है. नहीं, आज ब्रेष्त के चक्कर में कतई नहीं पड़ना है, मैं आगे स्टेशन की ओर बढ़ जाता हूं. लेकिन ब्रेष्त महाराज मेरा पीछा नहीं छोड़ते – स्टेशन का बाहरी हिस्सा अब भी पुराने दिनों की याद दिलाता है. इन्हीं सीढ़ियों पर ब्रेष्त महाशय हाथ में गुलदस्ता लेकर अपनी नई कमसिन नायिका गिज़ेला माई का इंतज़ार कर रहे थे. वादे के मुताबिक गिज़ेला आई तो ज़रूर, लेकिन इस बीच उसे पता चल चुका था कि ब्रेष्त ने उसी दिन हेलेने वाइगल से शादी की है. ब्रेष्त ने जब उसकी ओर  गुलदस्ता बढ़ाया था, तो जल-भुनकर गिज़ेला ने कहा था – कम से कम आज का दिन तो रहने देते. आज तुमने शादी की है ! नासमझ मासुमियत के साथ ब्रेष्त ने पलटकर सवाल किया था – तो क्या हुआ ?

बर्लिन आने पर मेरा मन बिल्कुल दकियानूस हो जाता है, सिर्फ़ दकियानूस ही नहीं, बेहद मर्दवादी. मुझे यह शहर एक बेहया औरत की तरह लगता है, जो लाज-हया की परवाह किये बिना बड़े ही बेहुदे ढंग से अपना अंग प्रदर्शन करती है. और ख़ासकर शहर के केंद्रीय इलाके में घूमते हुए मैं बर्लिन की ख़ास बोली सुनने को तरस जाता हूं – चारों ओर सिर्फ़ टूरिस्ट, अगर वे जर्मन भी बोलते हैं तो देश के अलग-अलग इलाकों के उच्चारण के साथ. रेस्त्रां या कैफ़े में सुंदरी बाला मुझसे बड़े प्यार से जर्मन अंदाज़ के साथ अंग्रेज़ी में बात करती है, पहले मैं तुनककर जर्मन में जवाब देता था, अब सिर्फ़ मुस्कराता हूं. सिर्फ़ बस ड्राइवर की बातों में मिठास नहीं होती है, और मैं ख़ुश हो जाता हूं. खांटी बर्लिनवाले के तौर-तरीके में एक खुरदरापन होता है, और उसी खुरदरेपन का अहसास पाने के लिये मैं बार-बार लौट-लौटकर बर्लिन आता रहता हूं.

शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन के बीचोबीच स्थित है बर्लिन का परिचित प्रतीक ब्रांडेनबुर्ग गेट, इस ऐतिहासिक गेट के पश्चिमी हिस्से की सड़क का नाम बदलकर 17. जून मार्ग कर दिया गया था, इस तरह अब उंटेर डेन लिंडेन सिर्फ़ गेट के पूरब की ओर है. इसी तरफ़ मशहूर प्रशियाई वास्तुकार शिंकेल रचित सारे भवन स्थित हैं : हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय, प्रिंसेन पैले, स्टेट ऑपेरा भवन और बेबेलप्लात्ज़, जहां नाज़ियों ने किताबों की होली जलाई थी. इनमें विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की वे सभी किताबें थीं, जो नाज़ियों की राय में जर्मन राष्ट्रवाद के अनुरूप नहीं थीं – जर्मन व विश्वसाहित्य की लगभग सारी अमर रचनायें. गोएथे और शिलर को उन्होंने बख़्श दिया था. मैंने सुना है कि जलाई गई किताबों में रवींद्रनाथ की रचनायें भी शामिल थीं. इज़्ज़त बच गई हमारे गुरुदेव की.

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पब के अंदर घुसकर युंकर अफ़सर ने चारों ओर देखा, एक खाली बेच पर बैठकर अपना बेल्ट ढीला किया. वेटर ने उसके सामने बीयर का घड़ा और मग रख दिया. मग में उड़ेलकर बीयर गटकने के बाद उसने एक लंबी सांस ली. क्या ज़माना आ गया है ! कमीनों पर गोली चलानी पड़ी, भाग गये, नहीं तो और कई को ख़त्म कर दिया जाता. उन दोनों को भी बंद कर दिया गया है. सालों ने एक नई पार्टी बनाई है - कम्युनिस्ट पार्टी. और वह सूअर की बच्ची तो यहूदिन है. अब राइख़्सटाग में सोशलिस्ट लोग भी बदमाशी पर तुले हुए हैं. देखा जाय, मामला कहां जाता है. बेचारा सम्राट !

बीयर का मग खाली हो चुका था. घड़े से उड़ेलकर वह एक सांस में पी गया. मग को सामने टेबुल पर पटककर तीखी आवाज़ में वह चिल्ला उठा : Die Sau muss weg ! ख़त्म कर दो सूअर की बच्ची को ! सब लोग उसकी ओर देखने लगे. कोने में बैठा एक सैनिक अपनी जगह से उठा. बिना कुछ बोले वह पब से बाहर निकल गया.

घंटे भर बाद वह सैनिक लौटा. युंकर अफ़सर के सामने खड़े होकर सधी हुई आवाज़ में उसने कहा : ख़त्म हो गई सूअर की बच्ची.

बर्लिन के लांडवेयर कानाल में कार्ल लीबक्नेष्त और रोज़ा लुक्सेमबुर्ग की लाशें बहा दी गई थीं. रोज़ा की मौत के बाद यूरोप के नवजात कम्युनिस्ट आंदोलन में कोई नहीं रह गया/गई था/थी, जो लेनिन जैसी महान क्रांतिकारी प्रतिभा, लेकिन मध्यवर्गीय लोकतंत्र विरोधी से लोहा लेता/लेती. लेनिन का नतीजा था स्तालिन, स्तालिन का नतीजा हिटलर, हिटलर का नतीजा विश्वयुद्ध, शीतयुद्ध, बर्लिन की दीवार, और जहां दीवार थी उसके नज़दीक पोट्सडामर प्लात्ज़ में आज सोनी का गगनचुंबी भवन, जिसे देखने के लिये ऊपर की ओर ताकते हुए मेरा गर्दन दुख रहा है.


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बर्लिन की तीखी-मीठी बोलियां :

पीओगे – मरोगे. नहीं पीओगे – फिर भी मरोगे. आओ, पीओ.

खुद ही अपने को एक घूंसा जड़ दो. मेरे पास टाइम नहीं है.

(नाक के पास तनी हुई मुट्ठी लाते हुए) सूंघकर देखो, कब्रिस्तान की महक है.

सितारों जैसे दांत; रात को बाहर निकल आते हैं.

अंदर आ जाओ, बाहर का नज़ारा देखने को मिलेगा.

सात बच्चे और दो बिस्तर और कोई ..सड़ीवाला दीवार के पास सोने को तैयार नहीं.

चालीसा के मारे की टिप्पणी : आंखें तो ठीक हैं, बस हाथ छोटे हो गये हैं.

गर रोज़गार न हो, तो कम से कम खाना क़ायदे से मिलना चाहिये.

किसी को तुमसे प्यार नहीं, फिर मुझे ही क्यों हो ?

शादी कर लो, फिर हंसते-हंसते जान निकल जाएगी.

अफ़सोस कि आपकी बीवी बेवा नहीं है.

यह साला ज़िंदा है – और शिलर की मौत हो गई.

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1979 से 1990. 11 साल तक पूर्वी जर्मनी में रेडियो पत्रकार के रूप में काम करता रहा. पूर्वी जर्मन पत्रकार के रूप में अपने अनुभवों पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी. एक दिलचस्प बात यह है कि चार तरीकों से मेरी निगरानी की जाती थी :  दफ़्तर में अपने विभाग में एक साथी मेरे बारे में रिपोर्ट करते थे, कम से कम एक पड़ोसी रिपोर्ट करता था, मेरी चिट्ठियों की निगरानी होती थी और मेरा टेलिफ़ोन टैप किया जाता था. इसका ज़िक्र इसलिये कर रहा हूं, क्योंकि इन अनुभवों के बाद मैं वामपंथ, साम्यवाद, स्तालिन व स्तालिनवाद और साम्यवादी व्यवस्था के बारे में बात करता हूं. मुझे कभी-कभी हंसी आती है कि बाहर से चीज़ों को देखते हुए लोग कैसे अपनी राय बना लेते हैं और नैतिकता के दावे के साथ अपना फ़ैसला सुनाते हैं.
बहरहाल, बर्लिन आने पर सबसे बड़ी दिक्कत सड़कों और मेट्रो स्टेशनों के नामों के साथ होती है. मैं पश्चिम बर्लिन आता-जाता था, लेकिन शहर के सिर्फ़ कुछ ही हिस्सों से परिचित था. इसके विपरीत पूर्वी बर्लिन को मैं अपनी हथेली की तरह पहचानता था. सड़कों के नाम अधिकतर परिचित थे, कम्युनिस्ट नेताओं के नाम दिये गये थे उन्हें. परंपरागत नामों और सम्राटों के नामों की जगह कम्युनिस्ट नेताओं के नाम रखने के लिये पूर्वी जर्मन शासन को चार दशक का समय मिला था. एकीकरण के बाद एकबारगी इन नामों को बदलने का जनून सवार हुआ. 1993 तक सारे नाम बदल चुके थे. तभी मैं बर्लिन छोड़कर कोलोन चला गया. नये नामों या परंपरागत नामों से परिचित होने का मौक़ा नहीं मिला. मिसाल के तौर पर कार्ल लीबक्नेष्त श्ट्रासे(स्ट्रीट) का नाम नहीं बदला गया, लेकिन लेनिनआल्ले का नाम अब लांड्सबैर्गर आल्ले और लेनिनप्लात्ज़ या चौक का नाम अब संयुक्त राष्ट्र चौक कर दिया गया है. नगर के केंद्रीय इलाके में कार्ल मार्क्स आल्ले(ऐवेन्यू) का नाम भी बदला जाने वाला था, तर्क यह था कि पश्चिम बर्लिन में एक सड़क का नाम कार्ल मार्क्स श्ट्रासे है. सोशल डेमोक्रेटों को इतना दूर जाना नहीं भाया. वैसे आलेक्ज़ांडरप्लात्ज़ और फ़्रीडरिषश्ट्रासे के बीच मार्क्स-एंगेल्स प्लात्ज़ का नाम अब हाकेषर मार्क्ट है. यहीं नज़दीक के पार्क में मार्क्स और एंगेल्स की आदमकद मूर्तियां हैं, जिसकी वेदी पर एकीकरण के बाद कुछ बदमाश लड़कों ने अलकतरे से लिख दिया था – माफ़ करना दोस्तों, यह तो बस एक आइडिया था.
अपनी परंपरा के नेताओं के नाम देते हुए या उनकी मूर्तियां लगाते हुए उन्हें अमर कर देना, इस उम्मीद के साथ कि कभी हमारा भी अमर होने का नंबर आएगा – तानशाहों की यह पुरानी आदत रही है. कम्युनिस्ट देशों में तो इसकी हद कर दी गई थी. लेनिन, स्तालिन, माओ से लेकर किम इल सुंग तक इसकी मिसालें बिखरी हुई हैं. मिसाल के तौर पर बर्लिन के प्रेंत्सलाउअर बैर्ग में थेलमान्न की विशाल मूर्ति स्थापित की गई. एक रूसी कलाकार की बनाई हुई मूर्ति, जिसमें लेनिन के चेहरे की झलक दिखती थी. कौतुकप्रिय पूर्वी बर्लिनवासियों ने इस मूर्ति का नाम लेमान्न रख दिया था. लेनिन के ले के साथ थेलमान्न का मान्न जोड़कर.
नाम बदलने का सिलसिला कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी में भी रहा है. शहर के पूरब के मुख्य मार्ग का परंपरागत नाम था फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले. स्तालिन की मौत के बाद उसका नाम स्तालिनआल्ले कर दिया गया. सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवी कांग्रेस के बाद स्तालिन का नाम गायब कर दिया गया. आधी सड़क का नाम फिर से फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले हो गया और बाकी आधी सड़क का नाम कार्ल मार्क्स आल्ले. मेरी पत्नी मारिता उन दिनों पांच-छः साल की हुआ करती थी. अपनी मां के साथ मेट्रो में जा रही थी. अचानक उसने कहा – मां, अब स्तालिनआल्ले स्टेशन आएगा. उसकी मां ने धीमे से डांटकर कहा – हुश्श, स्तालिनआल्ले नहीं, फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले. पांच साल की बच्ची ने मासुमियत के साथ पूछा था – क्यों ? स्तालिन की शादी हो गई है क्या ?


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जर्मन लेखकों, कलाकार-नाटककारों और चिंतकों में से मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है हाइनर म्युलर ने. वह मेरे पड़ोसी थे, लेकिन परिचय हुआ ब्रेष्त के पांच छात्रों में से एक, कवि और नाट्य निर्देशक क्लाउस ट्रागेलेन के ज़रिये. क्लाउस की पत्नी क्रिस्टा रेडियो में मेरी साथ काम करती थी. मैं जब आया तो उसे विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था. वजह यह थी कि क्लाउस उन दिनों पश्चिम जर्मनी गये हुए थे और टेलिविज़न के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि पूर्वी जर्मनी में उनके लिये काम करने के अवसर नहीं रह गये हैं. क्लाउस और क्रिस्टा के घर में पूरब और पश्चिम के लेखकों व कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था – हेलसिंकी घोषणा के बाद पश्चिम के नागरिकों के लिये दैनिक वीसा के साथ पूर्वी बर्लिन आना सरल हो गया था, हालांकि पूरब के नागरिक पश्चिम नहीं जा सकते थे – खैर, गुप्तचर विभाग श्टाज़ी क्रिस्टा से जानना चाहता था कि उसके घर में कौन से लोग आते हैं, क्या बात होती है. क्रिस्टा ने कुछ कहने से इंकार कर दिया था, और इसके बाद उसे विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था.
क्रिस्टा मुझसे दस-बारह साल बड़ी है, लेकिन मेरे बर्लिन पहुंचते ही उसने मुझे मां की तरह अपने डैनों में समेट लिया था. ट्रागेलेन परिवार में मेरी हैसियत लगभग घर के सदस्य जैसी थी. क्लाउस और हाइनर युवावस्था से ही गहरे मित्र थे. साठ के दशक में ट्रागेलेन ने बर्लिन-कार्ल्सहोर्स्ट के अर्थशास्त्र महाविद्यालय के छात्रों के साथ मिलकर हाइनर म्युलर के नाटक डी उमज़िडलरिन, या विस्थापिता का मंचन किया था. इस नाटक में पोलैंड का हिस्सा बन गये पुराने जर्मन इलाकों से आये शरणार्थियों के पूर्वी जर्मन समाजवादी समाज में समेकन की समस्याओं की गहराई में झांकने की कोशिश की गई थी. पूर्वी जर्मन नाटक के इतिहास में मील के पत्थर के रूप में इस नाटक व उसके मंचन को देखा जाता है. लेकिन मंचन के बाद संस्कृति विभाग ने इसे पार्टी-विरोधी घोषित कर दिया. ट्रागेलेन को पार्टी से निकाल दिया गया, चरित्र शोधन के लिये देश के दक्षिण में कोयले की खान में काम करने के लिये भेज दिया गया, ताकि उसे कामगारों की ज़िंदगी का सही परिचय मिले. हाइनर पार्टी सदस्य नहीं थे, उन्हें सिर्फ़ लेखक संघ से निकाला गया. तर्क यह दिया गया कि हाइनर म्युलर ने लेखक संघ का चंदा नहीं दिया है.
1979 में मैं जब पूर्वी बर्लिन पहुंचा तो शासक दल की सांस्कृतिक नीति करवटें ले रही थी. 1971 में एरिश होनेकर के पार्टी महासचिव बनने के बाद नाटक और लेखन के जगत में थोड़ा उदारवादी सा दौर आया था, लेकिन बहुतेरे लेखकों की रचनायें छापी नहीं जा रही थी, पार्टी के संस्कृति विभाग का पंजा नाट्य जगत पर कसा हुआ था. चंद साल पहले ट्रागेलेन और आइनार श्लेफ़ को बर्लिनर आंसाम्ब्ले में नाट्य निर्देशक की ज़िम्मेदारी दी गई थी और आलोचकों की राय में यह ब्रेष्त की मौत के बाद (पूर्वी) जर्मन नाट्यजगत का स्वर्णयुग था. पूर्वी जर्मन लेखकों और कलाकारों को पश्चिम की यात्रा और वहां काम करने की अनुमति भी दी जाने लगी थी. लेकिन 1976 में तेज़तर्रार गीतलेखक वोल्फ़ बियरमान्न द्वारा पश्चिम जर्मनी के कोलोन के एक कन्सर्ट में पूर्वी जर्मन नेतृत्व की तीखी आलोचना के बाद उनकी पूर्वी जर्मन नागरिकता छीन ली गई. इसके विरोध में पूर्वी जर्मनी के 100 से अधिक पहली पांत के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने पार्टी नेतृत्व को एक पत्रक भेजा था, जिसकी प्रतिलिपि फ़्रांसीसी वार्ता संस्था एएफ़पी को भी दी गई थी. काफ़ी उथलपुथल की स्थिति थी. कई लेखकों और कलाकारों को देशनिकाले का सामना करना पड़ा, कइयों को महीनों तक जेल में बंद रखा गया.
इस माहौल में क्लाउस ट्रागेलेन स्विटज़रलैंड और पश्चिम जर्मनी में यथार्थवादी-प्रगतिशील-समाजवादी – कुछ भी कह लीजिये – नाट्य मंचन कर रहे थे. हाइनर म्युलर को लंबे अरसे के बाद पूर्वी जर्मनी में ही एक नाट्य मंचन का मौक़ा दिया गया – शेक्सपीयर का मैकबेथ. लेकिन हाइनर म्युलर का मैकबेथ की उंगलियां तो पूर्वी जर्मन यथार्थ की ओर इशारा कर रही थी. मेरे बर्लिन पहुंचने के चंद हफ़्तों बाद ही युवा संगठन फ़्री जर्मन यूथ का अधिवेशन हुआ, जिसमें एक सांस्कृतिक बौने यानी संगठन के संस्कृति सचिव हार्टमुट क्योनिष ने हाइनर म्युलर (और शेक्स्पीयर) पर ज़बरदस्त हमला करते हुए कहा कि हमारी जनता को इनकी पतनोन्मुख कला की ज़रूरत नहीं है.
एक कट्टर कम्युनिस्ट के तौर पर मैं पूर्वी बर्लिन आया था. लेकिन कुछ समझने-बूझने से पहले ही मैं एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक भंवर में फ़ंस चुका था. समझ-बूझ नहीं थी, लेकिन इतना जानता था कि हर हालत में मुझे सांस लेने के लिये हवा की ज़रूरत है. आने वाले सालों में मेरा ठौर हवा की इस ज़रूरत के ज़रिये ही तय होता रहा.
क्रिस्टा और क्लाउस से मेरे गहरे संबंध बने हुए हैं. लेकिन गर्मी के महीनों में वे एस्तोनिया के एक गांव में रहते हैं, और जाड़े में मैं भारत में होता हूं. अभी परसो उनके घर गया था – उनकी बेटी मारिया का जन्मदिन था. क्लाउस की स्टडी की दीवार पर किताबों के रैक के बीच आज भी टंगी हुई है खान मज़दूर की वर्दी और हेलमेट. मुझे पूर्वी जर्मनी के एक दूसरे मशहूर नाटककार पेटर हाक्स के एक नाटक की याद आ रही थी – श्टाइन के घर में अनुपस्थित श्रीमान ग के बारे में बातचीत. श्रीमान ग यानी गोएथे. लेकिन यहां श्रीमान ग थे क्रिस्टा और क्लाउस ट्रागेलेन, हाइनर म्युलर, और उनके साथ जुड़ी हुई महत्वपूर्ण और हलकी-फुलकी घटनायें, जिनमें से कुछ अब इतिहास के हिस्से बन चुकी हैं.


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अल्लामियां ने बुद्धि भले ही न दी हो, मुझे ख़ूबसूरत ज़रूर बनाया है. अपनी जवानी में भी मैं ख़ूबसूरत हुआ करता था. साढ़े पांच फ़ीट का शानदार कद, सारे जिस्म में न कहीं चर्बी और न ही पेशियां, कमर से नीचे उतरती दो पतली टांगें, जो नीचे की ओर आते-आते थोड़ी गोल हो जाती है, पतली बांहों के आगे खिली हुई दो छोटी-छोटी हथेलियां – अगर थोड़ा स्मार्ट होता या बाप के पैसे होते, पता नहीं कैसे-कैसे करिश्मों की गुंजाइश थी. खैर, कैरेक्टर बच गया – मोर ऑर लेस. फ़िलहाल मोर नहीं, लेस की बात करुंगा, जब सारी कोशिशों के बावजूद फ़िसल गया, या कम से कम ख्याली पुलाव पकाता रहा कि मैं फ़िसल गया हूं.
बर्लिन की मेरी कहानियों में फ़िसलने की कहानियां भी शामिल हैं.
बनारस में अपना ज़माना आम तौर पर सिनेमा हॉल के अंधेरे में ब्रेल पद्धति से फ़िमेल ऐनाटोमी के अध्ययन का ज़माना होता था, जीवन की कड़ी वास्तविकता का परिचय पाने के लिये मुझे 17 साल की उम्र तक इंतज़ार करना पड़ा था. उसके बाद भी हालत यह थी कि जीने और मरने दोनों के लिये नाकाफ़ी. 26 साल की उम्र में जब बर्लिन पहुंचा तो दो उम्मीदें लेकर : सुना था कि जर्मन लोग पानी के बदले बियर पीते हैं और मैं इस आदत के समाजवादी संस्करण में सिद्ध होने के लिये बेताब था. दूसरी बात यह थी कि पता नहीं कैसे मेरे मन में यह बात बैठ गई थी कि यूरोप की, ख़ासकर समाजवाद में पली युवतियां आज़ाद खयालों की होती हैं, और मैं औरतों की आज़ादी का सिर्फ़ हिमायती ही नहीं हूं, उसे पसंद भी करता हूं. तब भी करता था. इस तरह मेरे मन में उम्मीदें उछल-कूद मचा रही थी कि हॉर्मोन की खुराक से फलते-फूलते पौधे की अब क़ायदे से सिंचाई होगी.
ख़ाक़ सिंचाई होगी ?
34 साल पहले के एक 26 साल के युवक की मानसिकता को पकड़ पाना और उसका बखान आसान नहीं है. फिर भी कोशिश करता हूं – इस जोखिम के साथ कि आजके युवक-युवतियों को वह युवक पोंगापंथी और बेहद मर्दवादी लग सकता है. अगर ऐसा लगता है तो यह बिल्कुल सही आकलन होगा. बात यह है कि युवतियां तो आज़ाद खयालों की थी, लेकिन यह बंदा अपनी कुंठाओं में ग्रस्त था. मैं जानता था कि कभी न कभी जीवन में पवित्र और शाश्वत प्रेम आएगा, लेकिन फ़िलहाल मैं उसके लिये बेचैन नहीं था. मुझे महज युवतियों का सान्निध्य चाहिये था और अगर मौक़ा मिले तो सेक्स, यानी साफ़ और सपाट लफ़्ज़ों में अपने नैतिक मापदंडों के अनुसार मैं ग़लत काम करना चाहता था. यह ज़रूर है कि देश में उस उम्र तक दो-चार बार प्यार हो चुका था, जिसका मतलब था हाथ पकड़ना या उससे कुछ ज़्यादा. देश छोड़ते समय किसी पर दिल भी आ गया था, लेकिन फ़िलहाल वह पवित्र भावना दिल के एक बंद दराज में बंद पड़ी थी.
लेकिन व्यवहारिक समस्यायें कम नहीं थी. पहली बात कि मुझे जर्मन नहीं आती थी और यह कतई पता नहीं था कि जर्मन न आना कोई समस्या ही नहीं है. दूसरी बात कि मैं नवंबर के अंत में बर्लिन पहुंचा, अगले ही दिन से दफ़्तर जाना शुरू किया. साढ़े चार बजे तक ड्युटी, और उसके बाद यूरोप के जाड़े का अंधेरा. दफ़्तर में आस-पास नज़र दौड़ाने पर पता चला कि मेरी उम्र की अधिकतर युवतियां या तो शादीशुदा हैं या किसी से बंधी हुई, और शादीशुदा हो या अनब्याही – आधे से अधिक मां बन चुकी थी. मैं जिस भवन में रहता था, वहां 16 मंज़िलों में 240 एक कमरे वाले फ़्लैट थे, यानी अधिकतर अकेले रहने वाले युवक-युवतियां, और उनमें से आधे विदेशी. इनमें से काफ़ी अंग्रेज़ी बोलने वाले थे, लेकिन अभी तक इन अनुकूल परिस्थितियों से वाकिफ़ नहीं हुआ था. एक परेशानी यह भी थी कि मेरे कपड़े अभी तक यूरोपीय सामाजिकता के अनुरूप नहीं थे. हालांकि स्कूली पढ़ाई के दौरान ही गांधी की आत्मकथा पढ़कर मैंने तय कर लिया था कि कभी अगर यूरोप जाने का मौक़ा मिले, तो अपनी पोशाक और कांटा-चम्मच चलाने के बारे में सोचे बिना बोदलेयर और रिलके की कविता के बारे में बात करूंगा, लेकिन बाहर निकलने पर अगर जाड़े से ठिठुरना पड़े, तो रिलके भी मदद के लिये सामने नहीं आते हैं.
उन्हीं दिनों हाउस कमेटी की ओर से फ़ाशिंग या कार्नेवाल की एक पार्टी का आयोजन किया गया था. बगल के फ़्लैट में रेडियो में अंग्रेज़ी विभाग में काम करने वाले आयरिश युवक नायल और उसकी स्कॉटिश-जर्मन प्रेमिका जेनी से दोस्ती हो चुकी थी, उनकी सलाह पर घर में पहनने के लिये लाये गये पैजामा-कुरते के साथ लुंगी को पगड़ी बनाकर और किसी तरह सिर में बांधकर जब यह बंदा पार्टी में पहुंचा, तो कम से कम कुछ लोगों को लगा कि कोई महाराजा आ गया है. बियर के लिये काउंटर बना हुआ था, जहां सस्ते में बियर मिल रही थी. पहली बार मैं खुला, लेकिन कितनी देर तक यह याद नहीं है. इतना पता है कि अगले दिन, यानी शनिवार की सुबह मैं अपने फ़्लैट में ही बिस्तर पर (अकेले) लेटा हुआ था.
इस पार्टी के एक हफ़्ते बाद शुक्रवार को दफ़्तर के बाद सूपरमार्केट से खरीदारी करते हुए घर पहुचकर चाय के लिये पानी चढ़ाया था कि कॉलिंग बेल बजने की आवाज़ सुनाई दी. शायद नायल या जेनी है, मैंने सोचा. दरवाज़ा खोला, तो जेनेवियेव खड़ी थी, फ़्रांस से आई कम्युनिस्ट युवती, विश्वविद्यालय में पढ़ा रही थी, फ़ाशिंग की पार्टी में परिचय हुआ था. उसने मुझसे कहा कि शाम को जर्मन कलाकार कैथे कोलवित्ज़ के स्थापत्य पर एक व्याख्यान होने जा रहा है, वह जा रही है. अगर मैं जाना चाहूं तो चल सकता हूं. आधे घंटे में निकलना है. मैंने हामी भर दी.


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अगली सुबह जब आंखें खुलने को हुई, तो सबसे पहले याद आया कि आज शनिवार है, दफ़्तर नहीं जाना है. ढाड़स का अहसास हुआ, क्योंकि सिर भारी लग रहा था. धीरे-धीरे आंखें खोली तो पता चला कि एक अनजान बिस्तर में, एक अनजान कमरे में हूं, हालांकि कमरा मेरे फ़्लैट जैसा ही था. शाम की घटनायें मन में तैरने लगी...
[उन दिनों मुझे पता भी नहीं था कि कैथे कोलवित्ज़ कौन थीं. व्याख्यान सुनने के बाद भी जानकारी नहीं बढ़ी, क्योंकि वह जर्मन में था. उसके बाद श्रोताओं के सवालों की बारी थी. जेनेवियेव ने अपने बैग से एक सिगार निकालकर सुलगाया (उस ज़माने में सिगरेट-बीड़ी पीने के नियम काफ़ी ढीले थे). एक देखने लायक सीन – एक पांच फीट की युवती, साथ में साढ़े पांच फीट का एक दाढ़ीवाला भारतीय युवक और युवती के होठों पर 6 इंच का सुलगता सिगार. मैं बुद्धिमान की तरह सवाल-जवाब सुनते हुए अपनी दाढ़ी खुजलाता रहा – यह क़ायदा मैंने एक छात्र नेता से सीखा था, जिन्हें हम बनारस के कार्ल मार्क्स कहते थे. खैर कार्यक्रम से बाहर निकलने के बाद जेनेवियेव ने कहा कि थोड़ा पैदल चलते हुए अगले स्टेशन से मेट्रो लिया जाय. मेरी किस्मत से ठंडक उस शाम थोड़ी कम थी, मैं उत्साह दिखाते हुए राज़ी हो गया. रास्ते में मैंने बताया कि कोलवित्ज़ के बारे में कुछ नहीं जानता हूं. उसे अचरज हुआ कि फ़्रांसीसी कवियों के बारे में जानता हूं, लेकिन कोलवित्ज़ के बारे में नहीं. फिर बोली – मैं तो भारत के बारे में कुछ नहीं जानती हूं. टैगोर का सिर्फ़ नाम सुना है. फिर उसने कहा – मेरे कमरे में आज वाइन नहीं है. मेरी बुद्धि अब काम करने लगी थी, समझ गया कि मेरे साथ वाइन पीना चाहती है. मैंने कहा – मेरे कमरे में भी नहीं है, लेकिन किसी पब या कैफ़े में चलते हैं. उसने कहा कि बेहतर होगा कि एक बोतल ख़रीद ली जाय. वाइन की बोतल लेकर हम दोनों उसके फ़्लैट में पहुंचे. ज़ाहिर है कि उसके बाद मैंने ही पहल की थी, लेकिन सिर्फ़ पहल ही. फिर उसने जो चाहा, वही हुआ.]
जेनेवियेव दो मग में कॉफ़ी लेकर आई, काली कड़ी कॉफ़ी, जिसकी आदत अभी नहीं बनी थी. कॉफ़ी पीते-पीते बात होती रही – ब्रेष्त, ईरान और नाटो के मिसाइल निर्णय के बारे में. उसके लिये यह कोई विषय ही नहीं था कि अभी-अभी हम दोनों एक जिस्मानी रात गुजार चुके थे. सब कुछ इस हद तक मामुली समझना – मुझे यह कुछ अजीब सा लग रहा था. जब मैं जाने लगा, तो अगली बार मिलने का कोई वादा भी नहीं हुआ. हां, जब मैं जाने लगा, तो उसने मुझे चूमा ज़रूर.

उस रात के बाद जेनेवियेव दो बार मेरे फ़्लैट में आई थी, मैं भी एक बार उसके फ़्लैट में गया था. लगभग तीन-चार हफ़्ते बाद जब एक शाम मैंने उसके फ़्लैट का बेल बजाया, तो एक बड़े तौलिये में लिपटी जेनेवियेव ने दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर झांका. मुझे देखकर झेंपते हुए उसने कहा – सॉरी उज़ुल, अभी गेस्ट हैं, बाद में आना. मुझे फ़ोन कर लेना.
उसके बाद हम कभी अकेले एक-दूसरे से नहीं मिले.



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जर्मनी में दो-तीन दिनों से थर्मामीटर का पारा बीस डिग्री से ऊपर तक पहुंच रहा है – बर्लिन में भी.
यूं तो बर्लिन में कोई मौसम नहीं होता है. बड़े-बड़े भवन, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, धूप हो तो चमड़ी (यूरोपीय हिसाब से) तपने लगती है, बारिश हो तो छाते के नीचे सिकुड़ना पड़ता है. जर्मनी के दूसरे शहरों की तरह यहां भी चारों ओर पेड़ लगे हैं, लेकिन बाकी सब कुछ इतने बड़े होते हैं कि पेड़ छोटे दिखने लगते हैं.

बर्लिन के चारों ओर झीलों और सभ्य जंगलों की भरमार है. झील तो शहर के अंदर भी हैं. गर्मी का मौसम जब आने लगता है तो बर्लिनवासी मौसम की तलाश में उनकी ओर दौड़ने लगता है. शहर की सड़कें हमेशा की तरह सुनसान दिखती हैं, लेकिन जंगलों में बनी पगडंडियों में आते-जाते लोगों के साथ मुलाक़ात होती रहती है, झीलों के किनारे भीड़ और शोर का बोलबाला रहता है. तुखोल्स्की के उपन्यास राइंसबैर्ग का नायक वोल्फ़चेन एक रविवार को अपनी प्रेमिका के साथ थोड़ी निर्जनता की तलाश में जब ऐसे जगहों में जाता है, तो उसे हर कहीं भीड़ ही भीड़ नज़र आती है. अपने बर्लिन प्रवास के दौरान दाम्पत्य कर्तव्य निभाने के लिये मुझे भी अक्सर झीलों और जंगलों का दौरा करना पड़ा है, लेकिन बनारसी अंदाज़ में कहा जाय तो – मज़ा नहीं आया.
वसंत आने के बाद यूरोप में जब पारा बीस डिग्री के ऊपर जाने लगता है, तो सारे बदन में एक अजीब सी सुरसुरी होने लगती है. बनारस में भी होती थी – ख़ासकर चैत की शुरुआत में जब 30-35 डिग्री के साथ एक बेहद बेकार सी ठंडी सुहानी हवा चलने लगती थी. कभी-कभी सोचता हूं कि वसंत और शरत के मौसम के बीच कितनी समानतायें और कितने अंतर हैं : वैसी ही धूप, वैसी ही बारिश, लेकिन वसंत में सूखी ठूंठों पर पत्ते आने लगते हैं और चंद ही दिनों में चारों ओर हरियाली छा जाती है. सितंबर ढलते-ढलते तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है. धूप और पारे की आंखमिचौनी तो वैसी ही रहती है, लेकिन हरे पत्ते धीरे-धीरे लाल हो जाते हैं, फिर पीले, फिर सूखकर झर जाते हैं. रंगों का यह खेल न्यारा होता है, लेकिन कहीं दिल के अंदर यह बात छिपी रहती है कि दिन अब छोटे होते जा रहे हैं, जल्द ही जाड़े का उदास मौसम आने वाला है. जब से मैं अक्टूबर में भारत जाने लगा हूं, यूरोप का पतझड़ मुझे कुछ ज़्यादा भाने लगा है.

बात यहीं ख़त्म करनी पड़ेगी. बाहर की धूप दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है.