Mittwoch, 4. Juni 2014

मैं सीआईए का एजेंट हूं.

गोदौलिया से चौक की ओर रास्ते पर दाहिने हाथ कोई पचास मीटर की दूरी पर ऐसेज़ नाम का एक मध्यवर्गीय रेस्त्रां हुआ करता था. पत्थर पर नक्काशी किये हुए किसी हद तक प्राचीन द्वार के अंदर अहाते में रेस्त्रां था, और बाहर फुटपाथ पर एक चाय की दुकान . बात 1974 की है. मैं वहीं से गुज़र रहा था कि देखा कि कई परिचित-अपरिचित नौजवान वहां खड़े-खड़े चाय पी रहे थे. उनमें से एक थे मेरे मित्र और इस बीच संबंधी अमिताभ भट्टाचार्य या बलाई. उन दिनों सीपीएम में सक्रिय बलाई ने मुझे देखते ही तपाक से बुलाया, चाय का आर्डर दिया, फिर परिचय करवाया - ये हैं उज्ज्वल, सीपीआई करते हैं और ये हैं नचिकेता, गांधीवादी हैं, आजकल जेपी आंदोलन में सक्रिय हैं.

नचिकेता ने मेरी ओर देखा और ठंडी आवाज़ में उसने कहा - हां, मैं सीआईए का एजेंट हूं. मुझे लगा कि यह तो बड़ा बेहुदा लड़का है. अभी जान-पहचान हुई नहीं कि हमला करने लगा. खैर, उसकी साधारण सी पोशाक की ओर देखते हुए मैंने कहा - लगता है कि सीआईए वाले पैसे देने में कंजूसी करते हैं. उसने मेरी पोशाक की ओर देखा और कहा - लगता है केजीबी वाले उससे भी ज़्यादा कंजूस हैं. मैंने कहा - मुझे क्या पता. जिनको देते हैं वे जानते होंगे. वैसे यह सही है कि जेपी आंदोलन के समर्थकों पर सीआईए के एजेंट होने का प्रचार चलाया गया था, ख़ासकर उनके ख़िलाफ़ जो किसी पार्टी से जुड़े नहीं थे. नचिकेता भी किसी पार्टी में नहीं थे. इसीलिये वह नाराज़ थे.

राजनीतिक रूप से वे गहरी निराशा के दिन थे. हालांकि पूरा विश्वास था कि जेपी का आंदोलन फ़ासीवादी है, लेकिन जिनके साथ हम साथ-साथ लड़ चुके थे, जेल में भी साथ थे - अब वे शासन के दमन तंत्र के शिकार थे और हम सरकार का समर्थन कर रहे थे. कई साल से बीएचयू में था, लेकिन डिग्री के नाम पर घंटा. कुछ दिनों से पीपीएच में काम कर रहा था. सोचा ईवनिंग कॉलेज में भर्ती होकर कम से कम बीए पास कर लिया जाय. वहां पहुंचा, तो सहपाठी के तौर पर मिले नचिकेता देसाई. चंद ही दिनों में दोस्ती हो गई. मैंने भी कभी सीआईए वाली बात नहीं छेड़ी.यह इमरजेंसी का दौर था. सीपीआई का सिपाही होने के नाते मैं इमरजेंसी का समर्थक और नचिकेता सबवर्सिव प्रचार में लगा हुआ. मुझे पता तो था, राजनीति पर बहस भी होती थी, लेकिन उसके राजनीतिक कामों के बारे में कभी बात नहीं हुई. उसके लिये स्थिति बेहतर थी, क्योंकि अधिकतर छात्र और अध्यापक इमरजेंसी के ख़िलाफ़ थे, लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था.

इसी बीच कॉलेज में डिबेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका विषय कुछ इस प्रकार का था - सामाजिक समता की ख़ातिर निजी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि नचिकेता निजी स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने वाला था, और मैं मन मारकर सामाजिक समता के पक्ष में खड़ा हो गया था. लेकिन जब डिबेट शुरू हुई, तो नचिकेता ने श्रोताओं से समझदारी की अपील करते हुए कहा कि वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है. उस परिस्थिति में इमरजेंसी का इससे प्रभावी विरोध कुछ हो ही नहीं सकता था. लेकिन इससे भी अचरज की बात यह थी कि जब मैं बोलने को खड़ा हुआ, मेरी ज़ुबान बंद सी हो गई, मुझसे कुछ बोला नहीं गया. माफ़ी मांगकर मैं मंच से उतर आया. नाटक का आखिरी अंक अभी बाकी था. सभा की कार्रवाई ख़त्म होने के बाद जब हम बाहर आये, तो वहां पुलिस खड़ी थी. नचिकेता को गिरफ़्तार कर लिया गया. अभी हाल में मुझे पता चला है कि थाने में ले जाने के बाद उसे छोड़ दिया गया था, क्योंकि उसने कुछ कहा नहीं था.

कुछ एक साल पहले फ़ोन पर हमारी बातचीत शुरू हो गई थी. वह गुजरात 2002 की दहशत से उबर नहीं पाया था. पहली ही बातचीत में उसने कहा कि जेपी आंदोलन में संघ को प्रतिष्ठा मिल गई, यह ग़लत था. इस बीच उस आंदोलन के बारे में मेरी राय काफ़ी बदल चुकी थी. फिर हम असहमत रहे, हालांकि कोई बहस नहीं हुई. चंद माह पहले अफ़लातून के बेटे व बेटी की जुड़वां शादी के मौके पर नचिकेता बनारस आया था, लगभग 38 साल बाद हमारी मुलाकात हुई. फिर एकबार सड़क के किनारे बेंच पर चाय, फिर एकबार गुजरे दिनों में लौट जाने की कोशिश...कितने बदल चुके हैं हम, लेकिन फिर भी वैसे ही लफ़ंगे रह गये हैं.

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