Mittwoch, 4. Juni 2014

इज़्ज़त का कारोबार

कुछ एक साल पहले की बात है. बनारस में उस वक्त इज़्ज़त का मौसम चल रहा था. आज दैनिक के दफ़्तर में गया हुआ था, पत्रकारों से बात हो रही थी, विदेशी मीडिया के प्रभाव पर चर्चा छिड़ी, तो एक पत्रकार ने गुजारिश की कि मैं इस मुद्दे पर एक साक्षात्कार दे दूं. मेरा काम तो साक्षात्कार लेना हुआ करता था, खैर मान गया. साक्षात्कार कैसे हुआ इसकी चर्चा छोड़ी जाय, बहरहाल वह छप गया. उसके दो हफ़्ते बाद शहर के पत्रकार संघ से फ़ोन आया कि वे मेरा सम्मान कर देना चाहते हैं, साथ ही चाहते हैं कि विदेशी मीडिया के कुप्रभाव पर हो रही परिचर्चा में बोलूं. मुझे यह विषय कुछ चुनौती जैसा लगा, मैं मान गया.
निर्धारित समय पर पड़ारकर भवन में पहुंचा, तो वहां कई दिग्गज मौजूद थे. दिल्ली से विभांशु दिव्याल और इंस्टीट्युट ऑफ़ मास कम्युनिकेशंस से मेरे पुराने मित्र प्रमोद माथुर आये हुए थे. चाय समोसे के साथ हमारा स्वागत हुआ, भाषण सुनने पड़े, बोलना भी पड़ा. वहां के माहौल से मुझे ऐसा लगा कि भूमिपुत्र होने के नाते मुझे सम्मान तो दिया जा रहा है, लेकिन शहर में वामपंथी युवा कार्यकर्ता के रूप में मेरे पुराने परिचय के कारण एक खेमा मुझसे निपटने के लिये तैयार होकर आया है. विदेशी मीडिया से बहुतों का मतलब अपसंस्कृति से था, सवाल भी अधिकतर कपड़ों की अपर्याप्तता के बारे में पूछे गये. मैंने उनसे कहा कि कपड़ों का अभाव को अगर अपसंस्कृति का मुहावरा समझा जाय, तो हमारी फ़िल्मों में उसके बहुतेरे नमूने देखे जा सकते हैं. एक नौजवान से मैंने पलटकर पूछा कि अगर किसी युवती अभिनेत्री का थोड़ा सा बदन दिख जाय तो वे इतने घायल क्यों हो जाते हैं. यूएनआई के शहर प्रतिनिधि ने अपने सवाल के तहत पश्चिमी संस्कृति के बारे में एक लंबे भाषण के बाद मुझसे कहा कि मैं हां या ना में जवाब दूं कि ऐसी हालत में...वगैरह-वगैरह. मैंने उनसे हां या ना में जवाब देने को कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी को पीटना छोड़ दिया है या नहीं. कुल मिलाकर माहौल मुझे पसंद आ रहा था.
एक युवा पत्रकार से परिचय हुआ, जो बार-बार मुझे कायल करने की कोशिश कर रहा था कि वह मेरी गहन विद्वता और विरल प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित है. इसी बीच शहर के वरिष्ठ पत्रकार ईश्वरी लाल मिश्र ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं दो दिन बाद काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में हो रही परिचर्चा में आऊं और वहां अपने विचार रखूं. मैंने उनसे पूछा, किस विषय पर, तो उन्होंने कहा कि विषय आप खुद चुन लीजिएगा. मैंने हामी भर दी. मेरा युवा पत्रकार मित्र काफ़ी उत्साहित दिखा और उसने कहा कि वह भी वहां पहुंच जाएगा.
काशी विद्यापीठ भी गया. दिव्याल जी ने एक क्रांतिकारी भाषण दिया. आज़ादी के दिनों की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि वे आज के पत्रकारों से हाथ जोड़कर विनती करना चाहते हैं कि अगर वे त्याग के लिये तैयार नहीं हैं तो यह पेशा छोड़ दें. मुझे जब बोलने का मौका मिला तो मैंने कहा कि अब क्या इस समाज में पत्रकार ही त्याग के लिये बचे हैं ? मेरा कहना था कि अगर पत्रकार अपने पेशे की ईमानदारी बरकरार रख पाते हैं, तो यह काफ़ी होगा. सारी खामियां यहीं दिख रही हैं. थोड़ी बहस हुई, जो परिचर्चा में जान लाने के लिये ज़रूरी भी थी. इसके बाद पता चला कि यहां भी मेरा सम्मान किया जाएगा. एक गणेश की मूर्ति दी गई, माला पहनाया गया. एक शाल ओढ़ाया गया.
बहरहाल, मंच पर बैठने के कुछ देर बाद ही मेरा युवा मित्र कुर्सी के पीछे उंकड़ू मार कर बैठते हुए मुझसे कह गया था कि वह आ गया है. मैंने प्रथानुसार अपनी ख़ुशी भी ज़ाहिर की थी. जब भाषण चलने लगे, पहला घंटा दूसरे घंटे की ओर सरकने लगा, तो वह फिर एकबार आया. उसने मुझसे कहा कि उसे अब जाना पड़ेगा. समझदारी दिखाते हुए मैंने कहा कि दफ़्तर का काम सबसे पहले. उसने कहा - नहीं सर, दफ़्तर से आज मैंने छुट्टी ले रखी है. दरअसल, मुहल्ले के क्लब में आज मुझे सम्मान दिया जाने वाला है.
मुझे अपने सम्मान की गरिमा की सापेक्षता के बारे में सचेत होना पड़ा. गनीमत है कि सम्मान देने का यह फ़ैशन बनारस में अब कुछ ढीला पड़ गया है. पिछले तीन-चार सालों से मुझे कहीं भी सम्मान देने के लिये बुलाया नहीं गया है. कभी कभी उसकी कमी खलती है. फिर सावधान हो जाता हूं : लालच बुरी बला है.

मैं सीआईए का एजेंट हूं.

गोदौलिया से चौक की ओर रास्ते पर दाहिने हाथ कोई पचास मीटर की दूरी पर ऐसेज़ नाम का एक मध्यवर्गीय रेस्त्रां हुआ करता था. पत्थर पर नक्काशी किये हुए किसी हद तक प्राचीन द्वार के अंदर अहाते में रेस्त्रां था, और बाहर फुटपाथ पर एक चाय की दुकान . बात 1974 की है. मैं वहीं से गुज़र रहा था कि देखा कि कई परिचित-अपरिचित नौजवान वहां खड़े-खड़े चाय पी रहे थे. उनमें से एक थे मेरे मित्र और इस बीच संबंधी अमिताभ भट्टाचार्य या बलाई. उन दिनों सीपीएम में सक्रिय बलाई ने मुझे देखते ही तपाक से बुलाया, चाय का आर्डर दिया, फिर परिचय करवाया - ये हैं उज्ज्वल, सीपीआई करते हैं और ये हैं नचिकेता, गांधीवादी हैं, आजकल जेपी आंदोलन में सक्रिय हैं.

नचिकेता ने मेरी ओर देखा और ठंडी आवाज़ में उसने कहा - हां, मैं सीआईए का एजेंट हूं. मुझे लगा कि यह तो बड़ा बेहुदा लड़का है. अभी जान-पहचान हुई नहीं कि हमला करने लगा. खैर, उसकी साधारण सी पोशाक की ओर देखते हुए मैंने कहा - लगता है कि सीआईए वाले पैसे देने में कंजूसी करते हैं. उसने मेरी पोशाक की ओर देखा और कहा - लगता है केजीबी वाले उससे भी ज़्यादा कंजूस हैं. मैंने कहा - मुझे क्या पता. जिनको देते हैं वे जानते होंगे. वैसे यह सही है कि जेपी आंदोलन के समर्थकों पर सीआईए के एजेंट होने का प्रचार चलाया गया था, ख़ासकर उनके ख़िलाफ़ जो किसी पार्टी से जुड़े नहीं थे. नचिकेता भी किसी पार्टी में नहीं थे. इसीलिये वह नाराज़ थे.

राजनीतिक रूप से वे गहरी निराशा के दिन थे. हालांकि पूरा विश्वास था कि जेपी का आंदोलन फ़ासीवादी है, लेकिन जिनके साथ हम साथ-साथ लड़ चुके थे, जेल में भी साथ थे - अब वे शासन के दमन तंत्र के शिकार थे और हम सरकार का समर्थन कर रहे थे. कई साल से बीएचयू में था, लेकिन डिग्री के नाम पर घंटा. कुछ दिनों से पीपीएच में काम कर रहा था. सोचा ईवनिंग कॉलेज में भर्ती होकर कम से कम बीए पास कर लिया जाय. वहां पहुंचा, तो सहपाठी के तौर पर मिले नचिकेता देसाई. चंद ही दिनों में दोस्ती हो गई. मैंने भी कभी सीआईए वाली बात नहीं छेड़ी.यह इमरजेंसी का दौर था. सीपीआई का सिपाही होने के नाते मैं इमरजेंसी का समर्थक और नचिकेता सबवर्सिव प्रचार में लगा हुआ. मुझे पता तो था, राजनीति पर बहस भी होती थी, लेकिन उसके राजनीतिक कामों के बारे में कभी बात नहीं हुई. उसके लिये स्थिति बेहतर थी, क्योंकि अधिकतर छात्र और अध्यापक इमरजेंसी के ख़िलाफ़ थे, लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था.

इसी बीच कॉलेज में डिबेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका विषय कुछ इस प्रकार का था - सामाजिक समता की ख़ातिर निजी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि नचिकेता निजी स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने वाला था, और मैं मन मारकर सामाजिक समता के पक्ष में खड़ा हो गया था. लेकिन जब डिबेट शुरू हुई, तो नचिकेता ने श्रोताओं से समझदारी की अपील करते हुए कहा कि वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है. उस परिस्थिति में इमरजेंसी का इससे प्रभावी विरोध कुछ हो ही नहीं सकता था. लेकिन इससे भी अचरज की बात यह थी कि जब मैं बोलने को खड़ा हुआ, मेरी ज़ुबान बंद सी हो गई, मुझसे कुछ बोला नहीं गया. माफ़ी मांगकर मैं मंच से उतर आया. नाटक का आखिरी अंक अभी बाकी था. सभा की कार्रवाई ख़त्म होने के बाद जब हम बाहर आये, तो वहां पुलिस खड़ी थी. नचिकेता को गिरफ़्तार कर लिया गया. अभी हाल में मुझे पता चला है कि थाने में ले जाने के बाद उसे छोड़ दिया गया था, क्योंकि उसने कुछ कहा नहीं था.

कुछ एक साल पहले फ़ोन पर हमारी बातचीत शुरू हो गई थी. वह गुजरात 2002 की दहशत से उबर नहीं पाया था. पहली ही बातचीत में उसने कहा कि जेपी आंदोलन में संघ को प्रतिष्ठा मिल गई, यह ग़लत था. इस बीच उस आंदोलन के बारे में मेरी राय काफ़ी बदल चुकी थी. फिर हम असहमत रहे, हालांकि कोई बहस नहीं हुई. चंद माह पहले अफ़लातून के बेटे व बेटी की जुड़वां शादी के मौके पर नचिकेता बनारस आया था, लगभग 38 साल बाद हमारी मुलाकात हुई. फिर एकबार सड़क के किनारे बेंच पर चाय, फिर एकबार गुजरे दिनों में लौट जाने की कोशिश...कितने बदल चुके हैं हम, लेकिन फिर भी वैसे ही लफ़ंगे रह गये हैं.

बर्लिन ! बर्लिन !

इसी शीर्षक से प्रसिद्ध जर्मन लेखक कुर्ट तुखोल्स्की की एक व्यंग्य रचना है. लेकिन मेरा इरादा व्यंग्य नहीं है. बर्लिन मेरी यादों का शहर है, जहां मैं 26 साल की उम्र में आया था और ज़िंदगी के 14 दिलचस्प साल मैंने इस शहर में बिताये. जब भी इस शहर में लौटता हूं, उन दिनों की याद और साथ ही, इस शहर की छोटी-छोटी घटनाओं में से झांकता इतिहास मेरे सामने तैर उठता है. मैं काफ़ी बदल चुका हूं, लेकिन यह शहर उससे भी ज़्यादा बदल गया है. इस कदर, कि मुझे लगता है कि किसी ने मेरी कोई प्यारी चीज़ मुझसे छीन ली है – जहां मेरा घर था, आज मैं वहां टूरिस्ट बन गया हूं.

अपने ठिकाने से निकलकर आज मेरा पहला पड़ाव था टाखेलेस, या जहां अभी दो साल पहले तक टाखेलेस हुआ करता था – शहर के केंद्र में ओरानियेनबुर्गर टोर के पास एक टुटा-फुटा मकान, जिसे अपने कब्ज़े में लेकर शहर के (ख़ासकर पूर्वी हिस्से के) युवा अपना अड्डा बना चुके थे – वैकल्पिक अराजकतावादी संस्कृति का केंद्र. यह इलाका सारे यूरोप के आवारा युवा संस्कृतिकर्मियों का मक्का बन चुका था. मकान अब भी उसी हालत में है, उसके सामने कई रेस्त्रां पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, जिनमें से एक भारतीय रेस्त्रां भी है. सामने आइनस्टाइन कैफ़े में युवा मैनेजर से पूछता हूं : क्या हाल है इलाके का ? मुंह बिचकाकर वह जवाब देता है – सन्नाटा है. बिजनेस कैसा चल रहा है ? – मेरा अगला सवाल. शिकायत करना मुश्किल है – वह जवाब देता है. इससे बड़ी तारीफ़ बर्लिनवाले से उम्मीद नहीं की जा सकती. मुस्कराकर सामने (भूतपूर्व) टाखेलेस की ओर देखता हूं. विशाल तख्ती पर हाइनर म्यूलर के नाटक Anatomie Titus Fall of Rome के प्रदर्शन की घोषणा. इस नाटक की प्रस्तुति के बाद ही टाखेलेस को यह भवन छोड़ना पड़ा था.

हाइनर म्युलर, ब्रेष्त के बाद जर्मन भाषा के सबसे बड़े नाटककार. मुझे 1989-90 की एक बातचीत याद आ गई. शहर के केंद्र में शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन जहां शुरू होती है, वहां चंद साल पहले जर्मन सम्राट फ़्रीडरिष द्वितीय की विशाल मूर्ति स्थापित की गई थी. हाइनर म्यूलर का सवाल :  “घोड़े पर सवार सम्राट के नीचे छोटी मूर्तियों को देखा है ?“ “हां, कौन सी ख़ास बात हैं उनमें ?“ खांटी ह्विस्की की छोटी सी चुस्की लेने के बाद हाइनर का जवाब : “सामने जनरलों और पादरियों की मूर्तियां, और पीछे जहां घोड़ा हगता-मूतता है, वहां जगह दी गई है लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को. हां, यह जर्मन इतिहास है.“

कुछ ख़ूबसूरत हैं, कुछ बदसूरत, लेकिन बर्लिन में विशाल भवनों की भरमार है. सम्राटों के ज़माने के भवन, तानाशाहियों के ज़मानों के भवन, और अब पूंजीवाद का जयगान करते हुए भवन, ख़ासकर शहर के केंद्र में – बर्लिन शहर आज जर्मन मेगालोमैनिया की कार्यशाला – उसका मंच बन चुका है. कला की दूसरी विधायें भले ही दम तोड़ रही हों, वास्तुकला अल्हड़पन के साथ बेरोकटोक अपनी जवानी का प्रदर्शन कर रही है. टहलते हुए फ़्रीडरिशश्ट्रासे तक पहुंचता हूं. दाहिने जाने पर ब्रेष्त की समाधि मिलेगी, बांये ब्रेष्त की आख़िरी कर्मभूमि बर्लिनर आंसाम्बले. मैं बांई ओर का रास्ता पकड़ता हूं. थोड़ी देर बाद मोड़ आता है, दाहिनी ओर बर्लिनर आंसाम्बले का भवन दिखाई दे रहा है. नहीं, आज ब्रेष्त के चक्कर में कतई नहीं पड़ना है, मैं आगे स्टेशन की ओर बढ़ जाता हूं. लेकिन ब्रेष्त महाराज मेरा पीछा नहीं छोड़ते – स्टेशन का बाहरी हिस्सा अब भी पुराने दिनों की याद दिलाता है. इन्हीं सीढ़ियों पर ब्रेष्त महाशय हाथ में गुलदस्ता लेकर अपनी नई कमसिन नायिका गिज़ेला माई का इंतज़ार कर रहे थे. वादे के मुताबिक गिज़ेला आई तो ज़रूर, लेकिन इस बीच उसे पता चल चुका था कि ब्रेष्त ने उसी दिन हेलेने वाइगल से शादी की है. ब्रेष्त ने जब उसकी ओर  गुलदस्ता बढ़ाया था, तो जल-भुनकर गिज़ेला ने कहा था – कम से कम आज का दिन तो रहने देते. आज तुमने शादी की है ! नासमझ मासुमियत के साथ ब्रेष्त ने पलटकर सवाल किया था – तो क्या हुआ ?

बर्लिन आने पर मेरा मन बिल्कुल दकियानूस हो जाता है, सिर्फ़ दकियानूस ही नहीं, बेहद मर्दवादी. मुझे यह शहर एक बेहया औरत की तरह लगता है, जो लाज-हया की परवाह किये बिना बड़े ही बेहुदे ढंग से अपना अंग प्रदर्शन करती है. और ख़ासकर शहर के केंद्रीय इलाके में घूमते हुए मैं बर्लिन की ख़ास बोली सुनने को तरस जाता हूं – चारों ओर सिर्फ़ टूरिस्ट, अगर वे जर्मन भी बोलते हैं तो देश के अलग-अलग इलाकों के उच्चारण के साथ. रेस्त्रां या कैफ़े में सुंदरी बाला मुझसे बड़े प्यार से जर्मन अंदाज़ के साथ अंग्रेज़ी में बात करती है, पहले मैं तुनककर जर्मन में जवाब देता था, अब सिर्फ़ मुस्कराता हूं. सिर्फ़ बस ड्राइवर की बातों में मिठास नहीं होती है, और मैं ख़ुश हो जाता हूं. खांटी बर्लिनवाले के तौर-तरीके में एक खुरदरापन होता है, और उसी खुरदरेपन का अहसास पाने के लिये मैं बार-बार लौट-लौटकर बर्लिन आता रहता हूं.

शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन के बीचोबीच स्थित है बर्लिन का परिचित प्रतीक ब्रांडेनबुर्ग गेट, इस ऐतिहासिक गेट के पश्चिमी हिस्से की सड़क का नाम बदलकर 17. जून मार्ग कर दिया गया था, इस तरह अब उंटेर डेन लिंडेन सिर्फ़ गेट के पूरब की ओर है. इसी तरफ़ मशहूर प्रशियाई वास्तुकार शिंकेल रचित सारे भवन स्थित हैं : हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय, प्रिंसेन पैले, स्टेट ऑपेरा भवन और बेबेलप्लात्ज़, जहां नाज़ियों ने किताबों की होली जलाई थी. इनमें विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की वे सभी किताबें थीं, जो नाज़ियों की राय में जर्मन राष्ट्रवाद के अनुरूप नहीं थीं – जर्मन व विश्वसाहित्य की लगभग सारी अमर रचनायें. गोएथे और शिलर को उन्होंने बख़्श दिया था. मैंने सुना है कि जलाई गई किताबों में रवींद्रनाथ की रचनायें भी शामिल थीं. इज़्ज़त बच गई हमारे गुरुदेव की.

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पब के अंदर घुसकर युंकर अफ़सर ने चारों ओर देखा, एक खाली बेच पर बैठकर अपना बेल्ट ढीला किया. वेटर ने उसके सामने बीयर का घड़ा और मग रख दिया. मग में उड़ेलकर बीयर गटकने के बाद उसने एक लंबी सांस ली. क्या ज़माना आ गया है ! कमीनों पर गोली चलानी पड़ी, भाग गये, नहीं तो और कई को ख़त्म कर दिया जाता. उन दोनों को भी बंद कर दिया गया है. सालों ने एक नई पार्टी बनाई है - कम्युनिस्ट पार्टी. और वह सूअर की बच्ची तो यहूदिन है. अब राइख़्सटाग में सोशलिस्ट लोग भी बदमाशी पर तुले हुए हैं. देखा जाय, मामला कहां जाता है. बेचारा सम्राट !

बीयर का मग खाली हो चुका था. घड़े से उड़ेलकर वह एक सांस में पी गया. मग को सामने टेबुल पर पटककर तीखी आवाज़ में वह चिल्ला उठा : Die Sau muss weg ! ख़त्म कर दो सूअर की बच्ची को ! सब लोग उसकी ओर देखने लगे. कोने में बैठा एक सैनिक अपनी जगह से उठा. बिना कुछ बोले वह पब से बाहर निकल गया.

घंटे भर बाद वह सैनिक लौटा. युंकर अफ़सर के सामने खड़े होकर सधी हुई आवाज़ में उसने कहा : ख़त्म हो गई सूअर की बच्ची.

बर्लिन के लांडवेयर कानाल में कार्ल लीबक्नेष्त और रोज़ा लुक्सेमबुर्ग की लाशें बहा दी गई थीं. रोज़ा की मौत के बाद यूरोप के नवजात कम्युनिस्ट आंदोलन में कोई नहीं रह गया/गई था/थी, जो लेनिन जैसी महान क्रांतिकारी प्रतिभा, लेकिन मध्यवर्गीय लोकतंत्र विरोधी से लोहा लेता/लेती. लेनिन का नतीजा था स्तालिन, स्तालिन का नतीजा हिटलर, हिटलर का नतीजा विश्वयुद्ध, शीतयुद्ध, बर्लिन की दीवार, और जहां दीवार थी उसके नज़दीक पोट्सडामर प्लात्ज़ में आज सोनी का गगनचुंबी भवन, जिसे देखने के लिये ऊपर की ओर ताकते हुए मेरा गर्दन दुख रहा है.


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बर्लिन की तीखी-मीठी बोलियां :

पीओगे – मरोगे. नहीं पीओगे – फिर भी मरोगे. आओ, पीओ.

खुद ही अपने को एक घूंसा जड़ दो. मेरे पास टाइम नहीं है.

(नाक के पास तनी हुई मुट्ठी लाते हुए) सूंघकर देखो, कब्रिस्तान की महक है.

सितारों जैसे दांत; रात को बाहर निकल आते हैं.

अंदर आ जाओ, बाहर का नज़ारा देखने को मिलेगा.

सात बच्चे और दो बिस्तर और कोई ..सड़ीवाला दीवार के पास सोने को तैयार नहीं.

चालीसा के मारे की टिप्पणी : आंखें तो ठीक हैं, बस हाथ छोटे हो गये हैं.

गर रोज़गार न हो, तो कम से कम खाना क़ायदे से मिलना चाहिये.

किसी को तुमसे प्यार नहीं, फिर मुझे ही क्यों हो ?

शादी कर लो, फिर हंसते-हंसते जान निकल जाएगी.

अफ़सोस कि आपकी बीवी बेवा नहीं है.

यह साला ज़िंदा है – और शिलर की मौत हो गई.

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1979 से 1990. 11 साल तक पूर्वी जर्मनी में रेडियो पत्रकार के रूप में काम करता रहा. पूर्वी जर्मन पत्रकार के रूप में अपने अनुभवों पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी. एक दिलचस्प बात यह है कि चार तरीकों से मेरी निगरानी की जाती थी :  दफ़्तर में अपने विभाग में एक साथी मेरे बारे में रिपोर्ट करते थे, कम से कम एक पड़ोसी रिपोर्ट करता था, मेरी चिट्ठियों की निगरानी होती थी और मेरा टेलिफ़ोन टैप किया जाता था. इसका ज़िक्र इसलिये कर रहा हूं, क्योंकि इन अनुभवों के बाद मैं वामपंथ, साम्यवाद, स्तालिन व स्तालिनवाद और साम्यवादी व्यवस्था के बारे में बात करता हूं. मुझे कभी-कभी हंसी आती है कि बाहर से चीज़ों को देखते हुए लोग कैसे अपनी राय बना लेते हैं और नैतिकता के दावे के साथ अपना फ़ैसला सुनाते हैं.
बहरहाल, बर्लिन आने पर सबसे बड़ी दिक्कत सड़कों और मेट्रो स्टेशनों के नामों के साथ होती है. मैं पश्चिम बर्लिन आता-जाता था, लेकिन शहर के सिर्फ़ कुछ ही हिस्सों से परिचित था. इसके विपरीत पूर्वी बर्लिन को मैं अपनी हथेली की तरह पहचानता था. सड़कों के नाम अधिकतर परिचित थे, कम्युनिस्ट नेताओं के नाम दिये गये थे उन्हें. परंपरागत नामों और सम्राटों के नामों की जगह कम्युनिस्ट नेताओं के नाम रखने के लिये पूर्वी जर्मन शासन को चार दशक का समय मिला था. एकीकरण के बाद एकबारगी इन नामों को बदलने का जनून सवार हुआ. 1993 तक सारे नाम बदल चुके थे. तभी मैं बर्लिन छोड़कर कोलोन चला गया. नये नामों या परंपरागत नामों से परिचित होने का मौक़ा नहीं मिला. मिसाल के तौर पर कार्ल लीबक्नेष्त श्ट्रासे(स्ट्रीट) का नाम नहीं बदला गया, लेकिन लेनिनआल्ले का नाम अब लांड्सबैर्गर आल्ले और लेनिनप्लात्ज़ या चौक का नाम अब संयुक्त राष्ट्र चौक कर दिया गया है. नगर के केंद्रीय इलाके में कार्ल मार्क्स आल्ले(ऐवेन्यू) का नाम भी बदला जाने वाला था, तर्क यह था कि पश्चिम बर्लिन में एक सड़क का नाम कार्ल मार्क्स श्ट्रासे है. सोशल डेमोक्रेटों को इतना दूर जाना नहीं भाया. वैसे आलेक्ज़ांडरप्लात्ज़ और फ़्रीडरिषश्ट्रासे के बीच मार्क्स-एंगेल्स प्लात्ज़ का नाम अब हाकेषर मार्क्ट है. यहीं नज़दीक के पार्क में मार्क्स और एंगेल्स की आदमकद मूर्तियां हैं, जिसकी वेदी पर एकीकरण के बाद कुछ बदमाश लड़कों ने अलकतरे से लिख दिया था – माफ़ करना दोस्तों, यह तो बस एक आइडिया था.
अपनी परंपरा के नेताओं के नाम देते हुए या उनकी मूर्तियां लगाते हुए उन्हें अमर कर देना, इस उम्मीद के साथ कि कभी हमारा भी अमर होने का नंबर आएगा – तानशाहों की यह पुरानी आदत रही है. कम्युनिस्ट देशों में तो इसकी हद कर दी गई थी. लेनिन, स्तालिन, माओ से लेकर किम इल सुंग तक इसकी मिसालें बिखरी हुई हैं. मिसाल के तौर पर बर्लिन के प्रेंत्सलाउअर बैर्ग में थेलमान्न की विशाल मूर्ति स्थापित की गई. एक रूसी कलाकार की बनाई हुई मूर्ति, जिसमें लेनिन के चेहरे की झलक दिखती थी. कौतुकप्रिय पूर्वी बर्लिनवासियों ने इस मूर्ति का नाम लेमान्न रख दिया था. लेनिन के ले के साथ थेलमान्न का मान्न जोड़कर.
नाम बदलने का सिलसिला कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी में भी रहा है. शहर के पूरब के मुख्य मार्ग का परंपरागत नाम था फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले. स्तालिन की मौत के बाद उसका नाम स्तालिनआल्ले कर दिया गया. सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवी कांग्रेस के बाद स्तालिन का नाम गायब कर दिया गया. आधी सड़क का नाम फिर से फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले हो गया और बाकी आधी सड़क का नाम कार्ल मार्क्स आल्ले. मेरी पत्नी मारिता उन दिनों पांच-छः साल की हुआ करती थी. अपनी मां के साथ मेट्रो में जा रही थी. अचानक उसने कहा – मां, अब स्तालिनआल्ले स्टेशन आएगा. उसकी मां ने धीमे से डांटकर कहा – हुश्श, स्तालिनआल्ले नहीं, फ़्रांकफ़ूर्टर आल्ले. पांच साल की बच्ची ने मासुमियत के साथ पूछा था – क्यों ? स्तालिन की शादी हो गई है क्या ?


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जर्मन लेखकों, कलाकार-नाटककारों और चिंतकों में से मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है हाइनर म्युलर ने. वह मेरे पड़ोसी थे, लेकिन परिचय हुआ ब्रेष्त के पांच छात्रों में से एक, कवि और नाट्य निर्देशक क्लाउस ट्रागेलेन के ज़रिये. क्लाउस की पत्नी क्रिस्टा रेडियो में मेरी साथ काम करती थी. मैं जब आया तो उसे विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था. वजह यह थी कि क्लाउस उन दिनों पश्चिम जर्मनी गये हुए थे और टेलिविज़न के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि पूर्वी जर्मनी में उनके लिये काम करने के अवसर नहीं रह गये हैं. क्लाउस और क्रिस्टा के घर में पूरब और पश्चिम के लेखकों व कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था – हेलसिंकी घोषणा के बाद पश्चिम के नागरिकों के लिये दैनिक वीसा के साथ पूर्वी बर्लिन आना सरल हो गया था, हालांकि पूरब के नागरिक पश्चिम नहीं जा सकते थे – खैर, गुप्तचर विभाग श्टाज़ी क्रिस्टा से जानना चाहता था कि उसके घर में कौन से लोग आते हैं, क्या बात होती है. क्रिस्टा ने कुछ कहने से इंकार कर दिया था, और इसके बाद उसे विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था.
क्रिस्टा मुझसे दस-बारह साल बड़ी है, लेकिन मेरे बर्लिन पहुंचते ही उसने मुझे मां की तरह अपने डैनों में समेट लिया था. ट्रागेलेन परिवार में मेरी हैसियत लगभग घर के सदस्य जैसी थी. क्लाउस और हाइनर युवावस्था से ही गहरे मित्र थे. साठ के दशक में ट्रागेलेन ने बर्लिन-कार्ल्सहोर्स्ट के अर्थशास्त्र महाविद्यालय के छात्रों के साथ मिलकर हाइनर म्युलर के नाटक डी उमज़िडलरिन, या विस्थापिता का मंचन किया था. इस नाटक में पोलैंड का हिस्सा बन गये पुराने जर्मन इलाकों से आये शरणार्थियों के पूर्वी जर्मन समाजवादी समाज में समेकन की समस्याओं की गहराई में झांकने की कोशिश की गई थी. पूर्वी जर्मन नाटक के इतिहास में मील के पत्थर के रूप में इस नाटक व उसके मंचन को देखा जाता है. लेकिन मंचन के बाद संस्कृति विभाग ने इसे पार्टी-विरोधी घोषित कर दिया. ट्रागेलेन को पार्टी से निकाल दिया गया, चरित्र शोधन के लिये देश के दक्षिण में कोयले की खान में काम करने के लिये भेज दिया गया, ताकि उसे कामगारों की ज़िंदगी का सही परिचय मिले. हाइनर पार्टी सदस्य नहीं थे, उन्हें सिर्फ़ लेखक संघ से निकाला गया. तर्क यह दिया गया कि हाइनर म्युलर ने लेखक संघ का चंदा नहीं दिया है.
1979 में मैं जब पूर्वी बर्लिन पहुंचा तो शासक दल की सांस्कृतिक नीति करवटें ले रही थी. 1971 में एरिश होनेकर के पार्टी महासचिव बनने के बाद नाटक और लेखन के जगत में थोड़ा उदारवादी सा दौर आया था, लेकिन बहुतेरे लेखकों की रचनायें छापी नहीं जा रही थी, पार्टी के संस्कृति विभाग का पंजा नाट्य जगत पर कसा हुआ था. चंद साल पहले ट्रागेलेन और आइनार श्लेफ़ को बर्लिनर आंसाम्ब्ले में नाट्य निर्देशक की ज़िम्मेदारी दी गई थी और आलोचकों की राय में यह ब्रेष्त की मौत के बाद (पूर्वी) जर्मन नाट्यजगत का स्वर्णयुग था. पूर्वी जर्मन लेखकों और कलाकारों को पश्चिम की यात्रा और वहां काम करने की अनुमति भी दी जाने लगी थी. लेकिन 1976 में तेज़तर्रार गीतलेखक वोल्फ़ बियरमान्न द्वारा पश्चिम जर्मनी के कोलोन के एक कन्सर्ट में पूर्वी जर्मन नेतृत्व की तीखी आलोचना के बाद उनकी पूर्वी जर्मन नागरिकता छीन ली गई. इसके विरोध में पूर्वी जर्मनी के 100 से अधिक पहली पांत के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने पार्टी नेतृत्व को एक पत्रक भेजा था, जिसकी प्रतिलिपि फ़्रांसीसी वार्ता संस्था एएफ़पी को भी दी गई थी. काफ़ी उथलपुथल की स्थिति थी. कई लेखकों और कलाकारों को देशनिकाले का सामना करना पड़ा, कइयों को महीनों तक जेल में बंद रखा गया.
इस माहौल में क्लाउस ट्रागेलेन स्विटज़रलैंड और पश्चिम जर्मनी में यथार्थवादी-प्रगतिशील-समाजवादी – कुछ भी कह लीजिये – नाट्य मंचन कर रहे थे. हाइनर म्युलर को लंबे अरसे के बाद पूर्वी जर्मनी में ही एक नाट्य मंचन का मौक़ा दिया गया – शेक्सपीयर का मैकबेथ. लेकिन हाइनर म्युलर का मैकबेथ की उंगलियां तो पूर्वी जर्मन यथार्थ की ओर इशारा कर रही थी. मेरे बर्लिन पहुंचने के चंद हफ़्तों बाद ही युवा संगठन फ़्री जर्मन यूथ का अधिवेशन हुआ, जिसमें एक सांस्कृतिक बौने यानी संगठन के संस्कृति सचिव हार्टमुट क्योनिष ने हाइनर म्युलर (और शेक्स्पीयर) पर ज़बरदस्त हमला करते हुए कहा कि हमारी जनता को इनकी पतनोन्मुख कला की ज़रूरत नहीं है.
एक कट्टर कम्युनिस्ट के तौर पर मैं पूर्वी बर्लिन आया था. लेकिन कुछ समझने-बूझने से पहले ही मैं एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक भंवर में फ़ंस चुका था. समझ-बूझ नहीं थी, लेकिन इतना जानता था कि हर हालत में मुझे सांस लेने के लिये हवा की ज़रूरत है. आने वाले सालों में मेरा ठौर हवा की इस ज़रूरत के ज़रिये ही तय होता रहा.
क्रिस्टा और क्लाउस से मेरे गहरे संबंध बने हुए हैं. लेकिन गर्मी के महीनों में वे एस्तोनिया के एक गांव में रहते हैं, और जाड़े में मैं भारत में होता हूं. अभी परसो उनके घर गया था – उनकी बेटी मारिया का जन्मदिन था. क्लाउस की स्टडी की दीवार पर किताबों के रैक के बीच आज भी टंगी हुई है खान मज़दूर की वर्दी और हेलमेट. मुझे पूर्वी जर्मनी के एक दूसरे मशहूर नाटककार पेटर हाक्स के एक नाटक की याद आ रही थी – श्टाइन के घर में अनुपस्थित श्रीमान ग के बारे में बातचीत. श्रीमान ग यानी गोएथे. लेकिन यहां श्रीमान ग थे क्रिस्टा और क्लाउस ट्रागेलेन, हाइनर म्युलर, और उनके साथ जुड़ी हुई महत्वपूर्ण और हलकी-फुलकी घटनायें, जिनमें से कुछ अब इतिहास के हिस्से बन चुकी हैं.


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अल्लामियां ने बुद्धि भले ही न दी हो, मुझे ख़ूबसूरत ज़रूर बनाया है. अपनी जवानी में भी मैं ख़ूबसूरत हुआ करता था. साढ़े पांच फ़ीट का शानदार कद, सारे जिस्म में न कहीं चर्बी और न ही पेशियां, कमर से नीचे उतरती दो पतली टांगें, जो नीचे की ओर आते-आते थोड़ी गोल हो जाती है, पतली बांहों के आगे खिली हुई दो छोटी-छोटी हथेलियां – अगर थोड़ा स्मार्ट होता या बाप के पैसे होते, पता नहीं कैसे-कैसे करिश्मों की गुंजाइश थी. खैर, कैरेक्टर बच गया – मोर ऑर लेस. फ़िलहाल मोर नहीं, लेस की बात करुंगा, जब सारी कोशिशों के बावजूद फ़िसल गया, या कम से कम ख्याली पुलाव पकाता रहा कि मैं फ़िसल गया हूं.
बर्लिन की मेरी कहानियों में फ़िसलने की कहानियां भी शामिल हैं.
बनारस में अपना ज़माना आम तौर पर सिनेमा हॉल के अंधेरे में ब्रेल पद्धति से फ़िमेल ऐनाटोमी के अध्ययन का ज़माना होता था, जीवन की कड़ी वास्तविकता का परिचय पाने के लिये मुझे 17 साल की उम्र तक इंतज़ार करना पड़ा था. उसके बाद भी हालत यह थी कि जीने और मरने दोनों के लिये नाकाफ़ी. 26 साल की उम्र में जब बर्लिन पहुंचा तो दो उम्मीदें लेकर : सुना था कि जर्मन लोग पानी के बदले बियर पीते हैं और मैं इस आदत के समाजवादी संस्करण में सिद्ध होने के लिये बेताब था. दूसरी बात यह थी कि पता नहीं कैसे मेरे मन में यह बात बैठ गई थी कि यूरोप की, ख़ासकर समाजवाद में पली युवतियां आज़ाद खयालों की होती हैं, और मैं औरतों की आज़ादी का सिर्फ़ हिमायती ही नहीं हूं, उसे पसंद भी करता हूं. तब भी करता था. इस तरह मेरे मन में उम्मीदें उछल-कूद मचा रही थी कि हॉर्मोन की खुराक से फलते-फूलते पौधे की अब क़ायदे से सिंचाई होगी.
ख़ाक़ सिंचाई होगी ?
34 साल पहले के एक 26 साल के युवक की मानसिकता को पकड़ पाना और उसका बखान आसान नहीं है. फिर भी कोशिश करता हूं – इस जोखिम के साथ कि आजके युवक-युवतियों को वह युवक पोंगापंथी और बेहद मर्दवादी लग सकता है. अगर ऐसा लगता है तो यह बिल्कुल सही आकलन होगा. बात यह है कि युवतियां तो आज़ाद खयालों की थी, लेकिन यह बंदा अपनी कुंठाओं में ग्रस्त था. मैं जानता था कि कभी न कभी जीवन में पवित्र और शाश्वत प्रेम आएगा, लेकिन फ़िलहाल मैं उसके लिये बेचैन नहीं था. मुझे महज युवतियों का सान्निध्य चाहिये था और अगर मौक़ा मिले तो सेक्स, यानी साफ़ और सपाट लफ़्ज़ों में अपने नैतिक मापदंडों के अनुसार मैं ग़लत काम करना चाहता था. यह ज़रूर है कि देश में उस उम्र तक दो-चार बार प्यार हो चुका था, जिसका मतलब था हाथ पकड़ना या उससे कुछ ज़्यादा. देश छोड़ते समय किसी पर दिल भी आ गया था, लेकिन फ़िलहाल वह पवित्र भावना दिल के एक बंद दराज में बंद पड़ी थी.
लेकिन व्यवहारिक समस्यायें कम नहीं थी. पहली बात कि मुझे जर्मन नहीं आती थी और यह कतई पता नहीं था कि जर्मन न आना कोई समस्या ही नहीं है. दूसरी बात कि मैं नवंबर के अंत में बर्लिन पहुंचा, अगले ही दिन से दफ़्तर जाना शुरू किया. साढ़े चार बजे तक ड्युटी, और उसके बाद यूरोप के जाड़े का अंधेरा. दफ़्तर में आस-पास नज़र दौड़ाने पर पता चला कि मेरी उम्र की अधिकतर युवतियां या तो शादीशुदा हैं या किसी से बंधी हुई, और शादीशुदा हो या अनब्याही – आधे से अधिक मां बन चुकी थी. मैं जिस भवन में रहता था, वहां 16 मंज़िलों में 240 एक कमरे वाले फ़्लैट थे, यानी अधिकतर अकेले रहने वाले युवक-युवतियां, और उनमें से आधे विदेशी. इनमें से काफ़ी अंग्रेज़ी बोलने वाले थे, लेकिन अभी तक इन अनुकूल परिस्थितियों से वाकिफ़ नहीं हुआ था. एक परेशानी यह भी थी कि मेरे कपड़े अभी तक यूरोपीय सामाजिकता के अनुरूप नहीं थे. हालांकि स्कूली पढ़ाई के दौरान ही गांधी की आत्मकथा पढ़कर मैंने तय कर लिया था कि कभी अगर यूरोप जाने का मौक़ा मिले, तो अपनी पोशाक और कांटा-चम्मच चलाने के बारे में सोचे बिना बोदलेयर और रिलके की कविता के बारे में बात करूंगा, लेकिन बाहर निकलने पर अगर जाड़े से ठिठुरना पड़े, तो रिलके भी मदद के लिये सामने नहीं आते हैं.
उन्हीं दिनों हाउस कमेटी की ओर से फ़ाशिंग या कार्नेवाल की एक पार्टी का आयोजन किया गया था. बगल के फ़्लैट में रेडियो में अंग्रेज़ी विभाग में काम करने वाले आयरिश युवक नायल और उसकी स्कॉटिश-जर्मन प्रेमिका जेनी से दोस्ती हो चुकी थी, उनकी सलाह पर घर में पहनने के लिये लाये गये पैजामा-कुरते के साथ लुंगी को पगड़ी बनाकर और किसी तरह सिर में बांधकर जब यह बंदा पार्टी में पहुंचा, तो कम से कम कुछ लोगों को लगा कि कोई महाराजा आ गया है. बियर के लिये काउंटर बना हुआ था, जहां सस्ते में बियर मिल रही थी. पहली बार मैं खुला, लेकिन कितनी देर तक यह याद नहीं है. इतना पता है कि अगले दिन, यानी शनिवार की सुबह मैं अपने फ़्लैट में ही बिस्तर पर (अकेले) लेटा हुआ था.
इस पार्टी के एक हफ़्ते बाद शुक्रवार को दफ़्तर के बाद सूपरमार्केट से खरीदारी करते हुए घर पहुचकर चाय के लिये पानी चढ़ाया था कि कॉलिंग बेल बजने की आवाज़ सुनाई दी. शायद नायल या जेनी है, मैंने सोचा. दरवाज़ा खोला, तो जेनेवियेव खड़ी थी, फ़्रांस से आई कम्युनिस्ट युवती, विश्वविद्यालय में पढ़ा रही थी, फ़ाशिंग की पार्टी में परिचय हुआ था. उसने मुझसे कहा कि शाम को जर्मन कलाकार कैथे कोलवित्ज़ के स्थापत्य पर एक व्याख्यान होने जा रहा है, वह जा रही है. अगर मैं जाना चाहूं तो चल सकता हूं. आधे घंटे में निकलना है. मैंने हामी भर दी.


.......


अगली सुबह जब आंखें खुलने को हुई, तो सबसे पहले याद आया कि आज शनिवार है, दफ़्तर नहीं जाना है. ढाड़स का अहसास हुआ, क्योंकि सिर भारी लग रहा था. धीरे-धीरे आंखें खोली तो पता चला कि एक अनजान बिस्तर में, एक अनजान कमरे में हूं, हालांकि कमरा मेरे फ़्लैट जैसा ही था. शाम की घटनायें मन में तैरने लगी...
[उन दिनों मुझे पता भी नहीं था कि कैथे कोलवित्ज़ कौन थीं. व्याख्यान सुनने के बाद भी जानकारी नहीं बढ़ी, क्योंकि वह जर्मन में था. उसके बाद श्रोताओं के सवालों की बारी थी. जेनेवियेव ने अपने बैग से एक सिगार निकालकर सुलगाया (उस ज़माने में सिगरेट-बीड़ी पीने के नियम काफ़ी ढीले थे). एक देखने लायक सीन – एक पांच फीट की युवती, साथ में साढ़े पांच फीट का एक दाढ़ीवाला भारतीय युवक और युवती के होठों पर 6 इंच का सुलगता सिगार. मैं बुद्धिमान की तरह सवाल-जवाब सुनते हुए अपनी दाढ़ी खुजलाता रहा – यह क़ायदा मैंने एक छात्र नेता से सीखा था, जिन्हें हम बनारस के कार्ल मार्क्स कहते थे. खैर कार्यक्रम से बाहर निकलने के बाद जेनेवियेव ने कहा कि थोड़ा पैदल चलते हुए अगले स्टेशन से मेट्रो लिया जाय. मेरी किस्मत से ठंडक उस शाम थोड़ी कम थी, मैं उत्साह दिखाते हुए राज़ी हो गया. रास्ते में मैंने बताया कि कोलवित्ज़ के बारे में कुछ नहीं जानता हूं. उसे अचरज हुआ कि फ़्रांसीसी कवियों के बारे में जानता हूं, लेकिन कोलवित्ज़ के बारे में नहीं. फिर बोली – मैं तो भारत के बारे में कुछ नहीं जानती हूं. टैगोर का सिर्फ़ नाम सुना है. फिर उसने कहा – मेरे कमरे में आज वाइन नहीं है. मेरी बुद्धि अब काम करने लगी थी, समझ गया कि मेरे साथ वाइन पीना चाहती है. मैंने कहा – मेरे कमरे में भी नहीं है, लेकिन किसी पब या कैफ़े में चलते हैं. उसने कहा कि बेहतर होगा कि एक बोतल ख़रीद ली जाय. वाइन की बोतल लेकर हम दोनों उसके फ़्लैट में पहुंचे. ज़ाहिर है कि उसके बाद मैंने ही पहल की थी, लेकिन सिर्फ़ पहल ही. फिर उसने जो चाहा, वही हुआ.]
जेनेवियेव दो मग में कॉफ़ी लेकर आई, काली कड़ी कॉफ़ी, जिसकी आदत अभी नहीं बनी थी. कॉफ़ी पीते-पीते बात होती रही – ब्रेष्त, ईरान और नाटो के मिसाइल निर्णय के बारे में. उसके लिये यह कोई विषय ही नहीं था कि अभी-अभी हम दोनों एक जिस्मानी रात गुजार चुके थे. सब कुछ इस हद तक मामुली समझना – मुझे यह कुछ अजीब सा लग रहा था. जब मैं जाने लगा, तो अगली बार मिलने का कोई वादा भी नहीं हुआ. हां, जब मैं जाने लगा, तो उसने मुझे चूमा ज़रूर.

उस रात के बाद जेनेवियेव दो बार मेरे फ़्लैट में आई थी, मैं भी एक बार उसके फ़्लैट में गया था. लगभग तीन-चार हफ़्ते बाद जब एक शाम मैंने उसके फ़्लैट का बेल बजाया, तो एक बड़े तौलिये में लिपटी जेनेवियेव ने दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर झांका. मुझे देखकर झेंपते हुए उसने कहा – सॉरी उज़ुल, अभी गेस्ट हैं, बाद में आना. मुझे फ़ोन कर लेना.
उसके बाद हम कभी अकेले एक-दूसरे से नहीं मिले.



.......


जर्मनी में दो-तीन दिनों से थर्मामीटर का पारा बीस डिग्री से ऊपर तक पहुंच रहा है – बर्लिन में भी.
यूं तो बर्लिन में कोई मौसम नहीं होता है. बड़े-बड़े भवन, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, धूप हो तो चमड़ी (यूरोपीय हिसाब से) तपने लगती है, बारिश हो तो छाते के नीचे सिकुड़ना पड़ता है. जर्मनी के दूसरे शहरों की तरह यहां भी चारों ओर पेड़ लगे हैं, लेकिन बाकी सब कुछ इतने बड़े होते हैं कि पेड़ छोटे दिखने लगते हैं.

बर्लिन के चारों ओर झीलों और सभ्य जंगलों की भरमार है. झील तो शहर के अंदर भी हैं. गर्मी का मौसम जब आने लगता है तो बर्लिनवासी मौसम की तलाश में उनकी ओर दौड़ने लगता है. शहर की सड़कें हमेशा की तरह सुनसान दिखती हैं, लेकिन जंगलों में बनी पगडंडियों में आते-जाते लोगों के साथ मुलाक़ात होती रहती है, झीलों के किनारे भीड़ और शोर का बोलबाला रहता है. तुखोल्स्की के उपन्यास राइंसबैर्ग का नायक वोल्फ़चेन एक रविवार को अपनी प्रेमिका के साथ थोड़ी निर्जनता की तलाश में जब ऐसे जगहों में जाता है, तो उसे हर कहीं भीड़ ही भीड़ नज़र आती है. अपने बर्लिन प्रवास के दौरान दाम्पत्य कर्तव्य निभाने के लिये मुझे भी अक्सर झीलों और जंगलों का दौरा करना पड़ा है, लेकिन बनारसी अंदाज़ में कहा जाय तो – मज़ा नहीं आया.
वसंत आने के बाद यूरोप में जब पारा बीस डिग्री के ऊपर जाने लगता है, तो सारे बदन में एक अजीब सी सुरसुरी होने लगती है. बनारस में भी होती थी – ख़ासकर चैत की शुरुआत में जब 30-35 डिग्री के साथ एक बेहद बेकार सी ठंडी सुहानी हवा चलने लगती थी. कभी-कभी सोचता हूं कि वसंत और शरत के मौसम के बीच कितनी समानतायें और कितने अंतर हैं : वैसी ही धूप, वैसी ही बारिश, लेकिन वसंत में सूखी ठूंठों पर पत्ते आने लगते हैं और चंद ही दिनों में चारों ओर हरियाली छा जाती है. सितंबर ढलते-ढलते तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है. धूप और पारे की आंखमिचौनी तो वैसी ही रहती है, लेकिन हरे पत्ते धीरे-धीरे लाल हो जाते हैं, फिर पीले, फिर सूखकर झर जाते हैं. रंगों का यह खेल न्यारा होता है, लेकिन कहीं दिल के अंदर यह बात छिपी रहती है कि दिन अब छोटे होते जा रहे हैं, जल्द ही जाड़े का उदास मौसम आने वाला है. जब से मैं अक्टूबर में भारत जाने लगा हूं, यूरोप का पतझड़ मुझे कुछ ज़्यादा भाने लगा है.

बात यहीं ख़त्म करनी पड़ेगी. बाहर की धूप दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है.

Sonntag, 29. Mai 2011

बर्लिन ज़ू का बाघ

सींखचों के उस पार से
देखते हैं मुझे
बच्चे, बूढ़े, औरतें.
उनके चेहरों पर
कभी मासूमियत झलकती है,
कभी हैरत,
और कभी-कभी यह डर भी :
अगर बीच में ये सींखचे न होते...

कभी-कभी वे
मेरी तारीफ़ के पुल बाँध देते हैं,
और हमारे बीच के फ़ासले में
डूब जाता है वो लंबा किस्सा
जो किसी बीहड़ जंगल से शुरू होकर
शहर के बीचोबीच
मुझे इस पिंजरे तक ले आता है.

यहां मुझे आराम से रखा गया है.
ठहरने-खाने-पीने का बंदोबस्त है.
दिल बहलाने के लिए
दिन भर लोग-बाग़ आते रहते हैं.
मुझे देखकर मुंह बनाते हैं,
जीभ निकालते हैं.
कभी-कभी
मैं भी उनके बीच होना चाहता हूं,
काश
अगर बीच में ये सींखचे न होते.

हर रोज़ मिलता है गोश्त.
ताज़ा नहीं,
लेकिन भरपेट.
यानी कि लोगों को देखते हुए
मुझे भूख तो नहीं सताती,
लेकिन झपटने का मन ज़रूर करता है.
मुझे औरतें पसंद हैं
ख़ास तौर पर.
कहीं ज़्यादा मांस होता है
उनके सीने, जांघों और नितंबों पर -
मेरे पुट्ठे तन जाते हैं,
एक लहर दौड़ जाती है खाल के उपर,
कहीं किसी के गले से
हल्की सीत्कार सी निकल आती है

मेरे पिंजरे के बाहर
एक तख़्ती पर करीने से लिखी गई है
मेरी जन्मपत्री -
कहां से मैं आया,
क्या है मेरी ख़ूबी,
कैसा है खानदान.
कभी-कभी
साथ में अपनी जमात लेकर
चश्मा पहने अधेड़ सा कोई शख्स आता है
और बताता है उन्हें
मेरे बारे में,
कि उस बीहड़ जंगल में,
जहां से मुझे लाया गया,
अब बाघ ख़त्म होते जा रहे हैं.
जबकि यहां
बर्लिन के बीचोबीच
गोरे साहबों की बदौलत
बाघों की तादाद बढ़ रही है.
इस बाघ से भी कई बच्चे हो चुके हैं.

बात सही है.
कभी-कभी
कोई बाघिन भेज दी जाती है
मेरे पिंजरे में.
वह ऊबती रहती है
और मैं भी.
लेकिन हमें पता होता है,
जब तक बाघिन गाभिन नहीं हो जाती,
एक-दूसरे से छुटकारा मिलने को नहीं.
चुनांचे...

दिन यूं ही गुज़रते हैं.
बीहड़ जंगल अब सपने में भी नहीं आता.
मैं ख़ुश तो नहीं,
मायूस भी नहीं हूं.
भले ही हर दिन एक जैसा होता है,
उन्हें अलग तरीके से देखने की कोशिश
बनी हुई है.
वैसे कभी-कभी
अपने आपसे सवाल करता हूं :
पिंजरे के बाहर से
अंदर झांकना कैसा होगा?
काश
अगर बीच में ये सींखचे न होते.

- उज्ज्वल भट्टाचार्य